वैसे तो हिन्दुस्तान 1947 में आज़ाद हुआ, लेकिन उसका एक क्षेत्र ऐसा भी है जो उस से भी पहले स्वतंत्र हो गया था| और वो भी एक ऐसी खूबसूरत जगह जो आज देश की सबसे बड़ी टूरिस्ट डेस्टिनेशनस में से एक है| हम बात कर रहे हैं अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की|
लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि कई दूसरे देशों के नज़दीक होते हुए भी अंडमान निकोबार भारत का ही हिसा क्यों बना? जैसे ये काफी कम लोग जानते हैं कि अंडमान और निकोबार बाकी सारे देश से पहले स्वतंत्र हो गया था, वैसे ही इस द्वीपसमूह के भारत के हिसा बनने का कारण भी सबको पता नहीं है|
अंग्रेजों के चंगुल से छूटने वाला पहला भारत का पहला टुकड़ा था अंडमान और निकोबार, और श्रेय जाता है नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को!
भारत की आज़ाद होने वाली सबसे पहली ज़मीन थी अंडमान-निकोबार| और ऐसा मुमकिन हो पाया था नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जज्बे की वजह से| द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होते ही नेताजी जर्मनी से सिंगापुर आये| और उसके बाद उन्होंने भारतीयों से ये वादा किया कि सन 1943 आते आते वे अपनी धरती पर अपना झंडा जरूर फहराएंगे!
और इसी दौरान अंडमान पर जापानी नवल फ़ोर्स का कब्ज़ा हो गया था, क्योंकि ब्रिटिशों ने बिना लड़े ही मैदान छोड़ दिया था| सभी राजनीतिक कैदियों को कालापानी जेल से निकाला गया और ब्रिटिश अफसरों और सैनिकों को बंदी बनाकर बर्मा भेज दिया गया|
और इसके बाद आज़ाद हिन्द फौज जापानी सेना को इस बात पर मनाने में कामयाब रही कि वो अंडमान और निकोबार को आज़ाद हिन्द सरकार को सौंप दे| 1943 में नेताजी पोर्ट ब्लेयर में उतरे और वहां जापानी मिलिट्री कमांडर से मिले| और फिर नेताजी ने भारतीयों से किया वादा निभाया और 30 दिसम्बर 1943 को अंडमान और निकोबार में तिरंगा फहराया गया!
जगत-प्रसिद्द सेलुलर जेल या कालापानी की जेल अंडमान और निकोबार में ही थी| और ब्रिटिश अपने कैदियों को इसी जेल में सजा देकर भेजा करते थे| और हमारे सबसे बड़े क्रान्तिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों को भी इसी जेल में भेजा गया था|
यहाँ भेजे गये भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों में प्रमुख नाम थे विनायक दामोदर सावरकर, योगेन्द्र शुक्ल, बटुकेश्वर दत्त, मौलवी लियाकत अली, नन्द गोपाल, भाई परमानन्द, और वामन राव जोशी|
Tuesday, November 27, 2018
अंदमान
"भाई, मैं पढ़ा लिखा होता तो बस मन्दिर में घण्टा बजा रहा होता।"
एक मन्दिर था। उसमें सब लोग पगार पर थे। आरती वाला, पूजा कराने वाला आदमी, घण्टा बजाने वाला भी पगार पर था। घण्टा बजाने वाला आदमी आरती के समय भाव के साथ इतना तन्मय हो जाता था कि होश में ही नहीं रहता था। घण्टा बजाने वाला व्यक्ति पूरे भक्ति भाव से खुद का काम करता था, मन्दिर में आने वाले सभी व्यक्ति भगवान के साथ साथ घण्टा बजाने वाले व्यक्ति के भाव के भी दर्शन करते थे, उसकी भी वाह-वाह होती थी।
एक दिन मन्दिर का ट्रस्ट बदल गया। नये ट्रस्टी ने ऐसा आदेश जारी किया कि अपने मन्दिर में काम करने वाले सब लोग पढ़े लिखे होना जरूरी है। जो पढ़े लिखे नहीं है, उन्हें निकाल दिया जाएगा। उस घण्टा बजाने वाले भाई ने ट्रस्टी से कहा कि 'तुम आज तक की पगार ले लो, अब से तुम नौकरी पर मत आना। उस घण्टा बजाने वाले व्यक्ति ने कहा, "साहेब भले मैं पढ़ा लिखा नही हूं, परन्तु इस कार्य में मेरा भाव भगवान से जुड़ा हुआ है। ट्रस्टी ने कहा,"सुन लो, तुम पढ़े लिखे नहीं हो, इसलिए तुम्हे नहीं रखा जाएगा।"
दूसरे दिन मन्दिर में नये लोगों को रखा गया। परन्तु आरती में आए लोगों को अब पहले जैसा आनन्द आता नहीं था। घण्टा बजाने वाले व्यक्ति की सभी को कमी महसूस होती थी। कुछ लोग मिलकर घण्टा बजाने वाले व्यक्ति के घर गए और विनती की, तुम मन्दिर आओ। उस भाई ने जवाब दिया, "मैं आऊंगा तो ट्रस्टी को लगेगा नौकरी लेने के लिए आया हूँ, इसलिए आ नहीं सकता हूँ।
वहां आये हुए लोगो ने एक उपाय बताया कि 'मन्दिर के बराबर सामने आपके लिए एक दुकान खोल के देते हैं। वहाँ आपको बैठना है। आरती के समय घण्टा बजाने आ जाना, फिर कोई नहीं कहेगा तुमको नौकरी की जरूरत है।" उस भाई ने मन्दिर के सामने दुकान शुरू की। वो इतनी चली कि एक दुकान से सात दुकान हो गईं। एक फैक्ट्री भी खोल ली। अब वो आदमी मर्सिडीज़ से घण्टा बजाने आता था। समय बीतता गया। ये बात पुरानी सी हो गयी।
मन्दिर का ट्रस्टी फिर बदल गया। नये ट्रस्ट को नया मन्दिर बनाने के लिए दान की जरूरत थी। मन्दिर के नये ट्रस्टी को विचार आया, सबसे पहले उस फैक्ट्री के मालिक से बात करके देखते हैं। ट्रस्टी मालिक के पास गया। सात लाख का खर्चा है, फैक्ट्री मालिक को बताया। फैक्ट्री के मालिक ने कोई सवाल किये बिना एक खाली चेक ट्रस्टी के हाथ में दे दिया और कहा चेक भर लो। ट्रस्टी ने चेक भरकर उस फैक्ट्री मालिक को वापस दिया। फैक्ट्री मालिक ने चेक को देखा और उस ट्रस्टी को दे दिया। ट्रस्टी ने चेक हाथ में लिया और कहा कि दस्तखत तो बाकी हैं। मालिक ने कहा मुझे दस्तखत करना नहीं आता है, लाओ अंगुठा मार देता हूं, वही चलेगा। ये सुनकर ट्रस्टी चौंक गया और कहा, "साहेब तुम अनपढ़ होकर भी इतनी तरक्की की, यदि पढ़े लिखे होते तो कहाँ होते।" तो वह सेठ हँसते हुए बोला, "भाई, मैं पढ़ा लिखा होता तो बस मन्दिर में घण्टा बजा रहा होता।" सीख
कार्य कोई भी हो, परिस्थिति कैसी भी हो, तुम्हारी लियाकत, तुम्हारी भावनाओं पर निर्भर है। भावनाएं शुद्ध होंगी तो ईश्वर और भाग्य पक्का तुम्हारा साथ देगा।
Saturday, November 17, 2018
यारी
#यारी
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" मौलवी साहब ..बाहिर आइये ...देखिये काफिरों ने क्या कर दिया ....अरे ! ' गीता रखी है मस्जिद में ...मस्जिद को नापाक करने की कोशिश की है ....!
दीनपुर ...एक ऐसी तहसील जिसका निजाम जुरूर परगना अधिकारी (S.D.M) के नाम से चलता है ...लेकिन जिसका कानून शहर काजी चलाते हैं ....मैंने उड़ते-उड़ते ये भी सुना है कि यहाँ शरीयत से तहसील हाँकी जाती है ....दबी जुबान में लोग इस तहसील को मुस्लिम गढ़ तो मुगलिया जागीर भी बयान करते हैं ...
यहाँ दाखिल होते ही दुनिया मुझे कुछ अलग सी लगी ...अलग सा एक वातावरण ..अजब सा एक दस्तूर ...आदमी बेसबब चेहरे पहने दिखे ...मगर औरतों के नाम पर मैंने सिर्फ काला लिबास देखा ,, पर्दा औरतों से होकर , हर मकान , दुकान से होता हुआ मजाहिब के उन सुतूनों (आधार स्तम्भ) पर भी डला था जहाँ बच्चियाँ कुरआन पढ़ती हैं ... बच्चियाँ यहाँ मेट्रो सिटीज या किसी छोटे -मोटे मॉडर्न शहर सी भी नही दिखती ...उनके सीने में कुरआन और सर पर हिजाब बयाँ करता है कि वह आदतन इस महौल और वेशभूषा में ढल चुकी हैं ....वक्त से पहले तजुर्बों से पकी उनकी अम्मियाँ भी सौदा मंगवाने के लिए बेंत या बाँस के पर्दे के पीछे से आवाज लगाती हैं ....
खुलेआम कटता गोश्त , और सींक कवाब , रुमाली रोटी पर घिरी भीड़ ये बयाँ करती है कि यहाँ कोई हिन्दू या गैर मजहबी नही रहता ....
लेकिन मेरा ये विश्वास अगले सात कदम पर दम तोड़ गया ... हरिहर पंक्चर वर्क्स का एक होर्डिंग एक बरगद के पेड़ पर टँगा मिला और उसी के साथ टँगे मिले दो स्कूटर के पुराने बेदम टायर ......
उसी होर्डिंग के नीचे झीनी कॉलर फरार कमीज पहनें एक साँवला सा अधेड़ एक टायर पर पंक्चर जोड़ता नजर आया ......
आगे तीन मुस्लिम बच्चों से अकेले लोहा लेता उसका 11 साला बच्चा ...दरअसल कंचे (अंठी ) पर बात ठन गई ...ऐसा लगा मुझे कि उसके साथ बेईमांटी ( बेमानी ) हुई थी..... बात गोट से लंगोट तक न पहुँचे तो हरिहर ने आवाज लगाकर चंदू को पुकारा और अपने पास बैठा लिया .....
लेकिन बचपन यदि खूँट से बंध जाए तो ...बचपन हराम कहलाता है ...हरिहर ने उसका बस्ता पेड़ से उतारा और ब्लेड से पेन्सिल छील उसके हाथ में टेक दी ..ताकि वो कल पंक्चर न जोड़े ...लेकिन ढेड़ सौ ग्राम आँसू जाया कर चुका चन्दू अब भी स्टोर में रखे आँसू जाया कर रहा था ....
" ये ले चन्दू ...मेरे कंचे ले ..ले !"
नदीम अशरफ खाँ,, चन्दू की ही उम्र का ही पिद्दा ...लेकिन खासियत ये कि शहर इमाम ( मौलवी) का लौंडा ...चन्दू ने लपक के कंचे ले लिए ..लेकिन हरिहर ने उसे अपनी कमीज से पोंछकर नदीम को वोवापस लौटा दिये ...और बोला ...
" नदीम बेटा ...रहने दो अभी हम काम से अलग होते ही दिलवा देंगे ...."
मैंने चन्दू की आँखों में इस बार आँसू नही एक चमक और स्नेह देखा ... बचपन ..बचपन पर फ़िदा हो चुका था ...मुझे यकीन था कि अब से कुछ दिन तलक ये साथ खेलेंगे ...फिर रसूख दबदबा और मजहब इस खेल को बिगाड़ देगा ....
लेकिन शुक्र खुदा का कि दोनों एक ही सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं तो दोस्ती टिकी रहेगी ....और चन्दू गरीब यानि उस तहसील की अल्पसंख्यक औलाद ..इमाम के लौंडे के साथ दोस्ती का सफल पेंच निभा पाया तो महफूज और खुशहाल भी रहेगा ....
इस मुस्लिम झुरमुट के बीच मुझे ..हरिहर का होना बहुत अखरा ..या मुझे उसपर कोशों तरस आया ... और उससे जियादह दर्द तब हुआ जब हरिहर की लुगाई को आते देखा ...वो पहनती तो सूट -सलवार है लेकिन करती वो भी पर्दा है ..फूँकनी से भी पतला जिस्म ..पैरों पर झेरे भर पायजेब ...हाथों में ऊंघती घूनी चूड़िया ...सुना रिवाज सा बन गया है शहर का ...कि औरत पर्दे में और आदमी पैर के टखनों से ऊपर तलक पायजामा और सर पर टोपी रखे ......
ये मेरी बर्रा खोपड़ी को लगने वाला दूसरा ...करंट था कि जब मैं अगले दिन चन्दू के स्कूल के करीब से गुजरा ...तो पता चला मास्टर काशीराम भी हिन्दू हैं....और अब तलक " श्रीराम " का नाम मैनेज करे हुयें है ...जबकि पांच वक्त गूँजती अजानें ...नात ..कव्वाली ..और इज्तमाओं के रेलों के बीच मैंने उनको कमर में हाथ धर उठते वक्त श्रीराम कहते हुए सुना .....
उनका श्रीराम को अक्सर याद कर लेना आता -जाता यूँ भी पचा लेता है क्यूँकि वो अंग्रेजी और गणित के कर्रे मास्टर है...और जैसा हाल हम तीसरी दुनिया के मर्दों का अंग्रेजी औरतों को देखकर होता है वैसा ही अंग्रेजी सुनकर भी ....क्यूँकि इन्हीं दो वसवसों में बहकर या बिककर हम में कुछ राम -अल्लाह वालों ने अपना भगवान और ईमान भी कभी बेचा है......
तकरीर भी अच्छी फूँक लेते है ..मास्टर जी ...मतलब वो आज भी हिम्मत रखते हैं ये कहने की ..कि भगवान या रहमान एक ही चीज है और हर मजहब और मजहब वालों की इज्जत ख़ुदा और राम का ही काम है .....
काशीराम के विश्वास के ही बूते ..कुछ और हिन्दू परिवार भी दीनपुर चले आये ...और किसी भी जमीन और मुल्क में अल्पसंख्यक चाहे कितने भी बड़े प्रेम और दया की बूँद हो ...सदैव उनके सागर बनने का भ्रम बना रहने से कुछ लोग इसपर दुकान और रमण लगाकर कारोबार जमा ही लेते हैं ....
इसी तरह दीनपुर के कुछ विशुद्ध कट्टर मुसलमानों ने उन्हें तंग और बदनाम करने की साजिशें शुरू कर दी ....वो किसी बड़ी घटना को अंजाम देने के वास्ते बस मौका और हथियार तलाश रहे थे ...
और वो वक्त बखूब आया भी ......एक रात इरफान मुल्ला अपने हुजरे में खा डकार के पेट की गैस से लोहा ले रहे थे ..और नींद उनसे कोशों दूर खड़ी होकर उनका मजाक उड़ा रही थी ...तभी उनके कानों में मस्जिद का दरवाजा खुलने की आवाज गिरी ....वो लुंगी डाल जैसे ही मस्जिद में दाखिल हुए ...मस्जिद के दरवाजों को खुला पाया ...उन्होंने अंदर झाँका ..और फिर दबे पैर अंदर दाखिल हुए ....लेकिन उनको कुछ नजर न आया लौट ही रहे थे कि तभी उनकी नजर मस्जिद के बड़े फूलदान पर जा लगी ...जो हौले -हौले काँप रहा था ..उन्होंने जाकर देखा तो पाया वहाँ एक किताब रखी थी ...उन्होंने हाथ से उसे उठाकर देखा तो चकरा गए ...लपककर ..गुस्से में फुंकार कर बाहिर आये और सीधे मौलवी साहब के हुजरे के बाहर खड़े होकर बोले -
" मौलवी साहब ..बाहिर आइये ...देखिये काफिरों ने क्या कर दिया ....अरे ! ' गीता रखी है मस्जिद में ...मस्जिद को नापाक करने की कोशिश की है ....!
देखते ही देखते ..बन्द दरवाजे खिड़कियाँ खुलने लगी ...और खुलने लगी जुबानें और औजारों की पेटियाँ ...हर पुराना हथियार गाजी होने की सनद थी ...वो दस एक हिन्दू परिवार ऐसे काँपने और रुँधने लगे जैसे मौत और उनके बीच महज एक दरवाजा खुलने या उसके टूटने तलक भर की देरी है ...पहली बार मास्टर काशीराम भी घुटनों पर आ गए ...उन्हें भी लगने लगा कि अब वो होने वाला है जो मेरी दी हुई विद्या और विश्वास सबको जला कर होम कर देगा .....
इस उठापटक में चन्दू कहीं नही दिख रहा था ...उसे लगातार जो आँखे और कदम ढूँढ रहे थे उनमें हरिहर , उसकी पत्नी के साथ उसका जिगरी यार नदीम भी था ....
आखिर यारी ने यारी को ढूँढ ही लिया क्यूँकि यारी को ही यारी के सारे अड्डे और फड्डे मालूम होते है ....तब तलक चन्दू के माता-पिता भी उस तलक पहुँच बना चुके थे ...चन्दू बहुत घबराया हुआ था और उसने नदीम से हकलाते हुए कुछ बोला...
तभी मौलवी साहब भीड़ को दिशा और हुक्म देने ऊपर मसाजिद की मीनार पर चढे ...मुझे पता नही था कि वो क्या कहेंगे ...तभी किसी ने पूरी भीड़ का हल्ला एक आवाज से काट दिया ...वो आवाज जो मस्जिद के अंदर रखे माइक से गुजर कर हर सिम्त फैलती चली गई ...
" अब्बू ...मस्जिद में ये किताब मैंने रखी है ..अब्बू मैं नदीम हूँ ...अब्बू आप ही ने कहा था कि अल्लाह के रसूल ने हर मजहब और मजहब वालों की इज्जत की ...आप ही ने कहा था कि उन्हें कुरआन के अलावा और हर किताब से नफरत होती तो वो उन तमाम किताबों को जलाने या ख़ाक करने का हुक्म देते जो किसी और खुदा की गवाही देते है ...अब्बू आप ही कहते है कि सच्चा इस्लाम वो जो गिरते हो उठाये ...अब्बू मैंने भी एक मजहब की ये मुक़द्दस किताब कहीं गिरी देखी और सोचा खुदा के घर में सम्हाल देता हूँ .. जिसकी होगी मेरा अल्लाह उसे लौटा देगा .....
थू साला थू ...करके भीड़ मुड़ने लगी ...लौंडा औकात से बाहर है ...लौंडे को छूट मिल गई है ..लौंडा हाथ से निकल गया है वगैरह -वगैरह कहकर भीड़ छँट गई .....और भीड़ के छँटते ही नजर आया चन्दू ...जिसने दौड़कर नदीम को अपने गले लगा लिया ...झर -झर आँसू बहने लगे ..हरिहर और उसकी लुगाई की आँखों से ....
तभी नदीम बोला ...ये तो बता तुझे ये किताब मिली कहाँ और तूने इसको मस्जिद में ही क्यूँ रखा पागल ...?
चन्दू बड़े लाड़ से बोला ...
" अले याल ...मुझे एक अंतल ने दस रूपये दिए और बोला मस्जिद में रख आ ..औल मैंने लख दी ....
मौलवी साहब जो उन दोनों बच्चों के स्नेह , प्रेम , समर्पण और मित्रता को देख आँखों में नमी लेकर मुस्कुराह रहे थे ...चन्दू का जवाब सुनकर सन्न रह गए ....क्यूँकि वो जान गए कि चन्दू जैसे मासूम को लालच देकर गीता, मस्जिद में रखवाने वाला कोई अपना ही था ....
खैर नदीम बोला -
" यार मास्टर जी ठीक बोलते हैं.. कि गीता में बड़ी ताकत है ...अल्हम्दुलिल्लाह आज देख भी लिया ......चल डब्बा-गिट्टी खेलते है " ......नवाज़िश
#जुनैद.........
Thursday, November 8, 2018
हवा में घुलता ज़हर
पटाख़े फूट रहे है.दरवाज़ा खोल बालकनी में गया तो धुआँ ही धुआँ सीधे नाक से होता फेफड़े में घुस आया. किसी घनघोर राष्ट्रवादी की दीवार पर पढ़ा था कि हमें मत सिखाओ कैसे त्योहार मनाना है. पर साँस तो तुम्हें भी लेना है न यार...
मिठाई खा लिये. दोस्तों के साथ त्योहार मना लिये. तिलक वाली तस्वीर लगा लिये. अब साँस फूल रही है. दरवाज़ा, खिड़की बंद कर बैठे है. ऐसा लग रहा है सारा ऑक्सिजन सोख लिया गया है.
वो कौन होगा जो अपने हाथो अपना गला घोंट लेगा. अफ़सोस वो हम ही है. देवी लक्ष्मी से धन की कामना करते हाँफते लोग क्या थोड़ी सी साफ़ हवा भी नही माँग सकते. माँगने की ज़रूरत भी नही होगी. सबअपने हाथ में ही है.
Saturday, November 3, 2018
धर्मांधता
चार औरतों में बहस होती है... एक औरत (जो बाकी तीनों औरतों के धर्म की नहीं थी) पर इल्जाम लगता है कि उसने बाकी तीनों औरतों के धर्म का मजाक उङाया...
मामला दर्ज किया जाता है...
ट्रायल कोर्ट उस औरत को फांसी की सजा सुनाती है,
वो औरत हाईकोर्ट में अपील करती है... हाईकोर्ट उस औरत की फांसी की सजा बरकरार रखती है...
तब तक समाज के कुछ बुद्धिजीवी वर्ग इस फैसले के खिलाफ खङे होते हैं और उस औरत का सपोर्ट करते हैं...
सभी को धर्म विरोधी घोषित करके कत्ल कर दिया जाता है... इन सभी बुद्धिजीवियों के कारण धर्म खतरे में पड़ गया था और फिर कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक सेनाओं के अलग अलग रेजिमेंट ने उनका कत्ल किया और अपने धर्म की रक्षा की..
उस औरत को बलात्कार करने और जान से मारने की धमकी दी जाती है... इन सब के बीच मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा... और सुप्रीम कोर्ट के जज ने निचली अदालतों के फैसले को पलटा और उस औरत को बाईज्जत बरी किया...
अब थोड़ी राहत की सांस लीजिए... शुक्र कीजिए ये हमारे देश का मामला नहीं है... ये घटना पाकिस्तान की है...
और वो औरत थी क्रिश्चियन जिनका नाम था आसिया बीबी (5 बच्चों की माँ) और बाकी तीनों थी मुस्लिम...
उस क्रिश्चियन औरत के सपोर्ट में आने वाले बुद्धिजीवियों के वजह से जिनका धर्म खतरे में पड़ गया था वो था जमात-उद-दावा जैसे कई सांस्कृतिक गुट और हाफिज सईद जैसे कई समाजसेवी और धर्मरक्षक नेता...
खैर... अब जिस धर्म विरोधी और देशद्रोही सुप्रीम कोर्ट के जज ने निचली अदालतों का फैसला पलटा... उसके कोर्ट के बाहर मीडिया में बयान से तो लग रहा था कि पता नहीं किस सुबह की सूरज उसे नसीब न हो...
लेकिन जरा सोचिए उस ट्राइल कोर्ट और लाहौर हाईकोर्ट के जज के बारे में... आखिर उसकी ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि एक जज के पद पर बैठ कर एक तुच्छ आरोप के आधार पर सीधे मौत का फरमान सुना दिया... जाहिर है ये एक जाहिलियत थी... जो उसने धर्मांधता के आगोश में आकर ये फैसला सुनाया था...
धर्म और जाहिलियत दोनों एक ही बात है... जिसने एक सुशिक्षित इंसान को भी अपने कर्तव्यों और मानवीय संवेदनाओं से परे कर दिया... तो अशिक्षितों की क्या मजाल..
अब जरा अपने देश के बारे में सोचिए... यही जाहिलियत थी जो पिछले सत्तर सालों से हिंदुस्तान और पाकिस्तान की मुल्यों को अलग रख रही थी...
आजादी के बाद हमने नेहरू जी का रास्ता चुना और चांद तक पहुंच गये... उसने जिन्ना का रास्ता चुना अभी तक कश्मीर में नहीं घुस पा रहा...
एक राम-मंदिर के लिए आज तक लाखों जाने चली गई और हजारों औरतों का बलात्कार हुआ... कल वो मंदिर अगर बन कर खड़ा हो गया तो राम जी को भी अपने धर्म और उनके रक्षकों के वीरगाथाओं पर गर्व होगा...
मजाल है आप उसके खिलाफ एक शब्द बोल दो... उसको छोङो गाय के नाम पर खुलेआम कत्ल हो रहा है... सरकार के केंद्रीय मंत्री तक उन कातिलों को फूल माला पहना रहे हैं... मजाल है कि कोई बुद्धिजीवी उनके खिलाफ खङे हो जाए... होते हैं लेकिन सभी के सभी धर्म विरोधी और देश विरोधी ही होते हैं...अगर औरत हुई फिर तो सावरकरवाद जिंदाबाद...
बस कुछ दिन और...उन धर्म विरोधी बुद्धिजीवियों का कत्ल भी होगा.... अभी सिर्फ बलात्कार की धमकियां ही मिल रही है...कुछ दिन बाद ऐसा होना असंभव नहीं लग रहा और ना ही ज्यादा मुश्किल... और बलात्कार की धमकियां और गालियाँ देने वाले लोगों को तो खुद इस देश का प्रधानमंत्री ट्विटर पर फॉलो करते हैं...
बस हमारे कुछ सांस्कृतिक और धार्मिक संगठनों को थोड़ा और मजबूत होने की देर है (बिल्कुल पाकिस्तान की तर्ज पर) ... सत्तर सालों से तो ये अपनी चड्डी ही संभाल रहे थे... लेकिन पिछले कुछ सालों से इन्हें पुरी संरक्षण मिल रही है...
अभी तक तो फिलहाल हथियार ही बरामद होते आ रहे हैं...
अभी हम पुरी तरह पाकिस्तान थोड़ी बने हैं... वो समय भी आने वाले हैं...अगर सब कुछ ऐसा ही चलता रहा तो... क्या पता शायद वही अच्छे दिन हो...
Friday, November 2, 2018
अलादीन का चिराग़
🔴#_अच्छे _लोग _अच्छी _सोच 🔴
जब डॉक्टर ने ये बताया था ना , बधाई हो बेटी हुई है । मैंने लड्डू बांट दिए थे पूरे अस्पताल में क्योंकि मुझे शिखा ( पत्नी) जैसी बेटी ही चाहिए थी ।जब चलती थी ना तो उसके छोटे छोटे पैरों की पायल की गूंज पूरे घर में दौड़ जाती थी ।मुझे याद है उसने पहली बार जब पापा बोला था। कितना खुश था मैं । मैंने उसे अपने गोद में उठा लिया घंटों में उससे बोलता रहा , बेटा पापा बोलो , पा.....पा ,पा......पा और वो गर्दन मटकाने लगती । मैं उसकी हर नादानी पर बहुत हंसता ।
जब वो पांचवी में थी उसने पापा के ऊपर निबंध लिखा । उसने लिखा मेरे पापा हीरो है ।जो उसने अपने शब्दों में लिखा था , दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है जो पापा मेरे लिए नहीं ला सकते और ऐसा कोई काम नहीं जिसे पापा नहीं कर सकते । मेरे पापा अलादीन के चिराग हैं ।मैंने न जाने कितनी बार उस निबंध को पढ़ा । जब भी मैं उसे पढ़ता तो मुझे एक सफल पिता की झलक उसमें दिखती
अपनी मां की चुन्नी ओढ़कर अक्सर मुझे खाना बनाकर खिलाती ।
धीरे धीरे मेरी प्लास्टिक की गुड़िया दादी अम्मा बन गई ।मैं उसमें अपनी मां की छवि देखता ।हर बात पर मुझे डांटना ।,"पापा आप ऐसे क्यों करते हो ?पापा आप ऐसे क्यों नहीं करते ? इतने सवाल उसके हर सवाल को मजाक में उड़ा दिया करता । जब कभी सफाई करती पोछा लगाती है मैं उसकी पोचे के अंदर अगर चप्पल पहन कर आ जाता तो मानो मेरी मां ही मुझे डांट रही हो
गुस्से में पापा मैंने पोछा लगाया है ।
मैं बोल देता बेटा मुझे नजर नहीं आया था।
पापा आप रोज ऐसे ही करते हो ।
अच्छा , अच्छा अब नहीं करुंगा ।
मैंने उससे कहा था । तुम आर्ट ले लो कॉलेज में उसने कहा नहीं मुझे साइंस पढ़नी है । साइंस की सुविधा हमारे शहर में नहीं थी ,दूसरे शहर मैंने उसे पढ़ने के लिए भेजा ।सचमुच जिस दिन वो जा रही थी ना मैं रोया था । शिखा ने मुझे समझाया ," अभी तो बेटी कॉलेज जा रही है । आप अभी से इतना रो रहे हैं ।जिस दिन ससुराल जाएगी उस दिन कितना रोयेंगे ?"
अब कॉलेज भी पूरा हुआ । तलाश एक अच्छे लड़के की जो मेरी बेटी को मेरी तरह खुश रख सके। उसके लिए मैं कोई भी कीमत देने के लिए तैयार था ।अच्छे से अच्छा घर ,अच्छे से अच्छा परिवार मैं उसके लिए देखना चाहता था । मैंने एक आलीशान घर में उसका रिश्ता तय किया ।जहां किसी चीज की कोई कमी नहीं थी ।मुझे लगा कि मेरी बेटियां सुख से रहेगी । क्या हुआ जो मैं अपनी सारी FD तुड़वा दूंगा ।क्या हुआ जो मैंने अपने बुढ़ापे के लिए कुछ बचा कर नहीं रखा है । उसे भी मैं उसकी झोली में डाल दूंगा लेकिन उसके लिए तो खुशियां खरीद लूंगा ना ।और मैंने खरीद लीं उसके लिए खुशियां ।शादी वाले दिन जब वो गहना जेवरों से लदी हुई थी तो मैं सारे दुख भूल गया था कि मैंने अपने लिए एक पाई भी नहीं छोड़ी है ।
उसकी विदाई के समय मैं बहुत रोया , बहुत ज्यादा ।उसकी गाड़ी जब बारात घर से निकली तो बाहर मैं घंटों खड़ा होकर रोया ।मुझे नहीं पता था मेरी चिड़िया 1 दिन ऐसे उड़ जाएगी मेरे घोसले से ।उसकी भी आंखें जहां तक गाड़ी मुड़ी मेरे ऊपर ही टिकी थीं । मैंने संभाल लिया खुद को आखिर यही नियम है । बेटी को एक दिन अपने घर जाना ही है।
उसके जाने के बाद भी उसको भूलना नामुमकिन था ।जब भी चप्पल पहनकर अंदर आता ना तो मुझे गुड़िया याद आती । जब भी अपनी प्रेस के कपड़े ढूंढता तो मुझे गुड़िया याद आती । जब भी एक कप चाय पीने का मन होता तो मुझे गुड़िया याद आती ।जब भी शिखा मुझे डांटती तो मुझे गुड़िया याद आती , कैसे मैं हंसकर कह दिया करता था देखो गुड़िया तुम्हारी मम्मी मुझे डांट रही है । जब भी मैं कुछ भारी समान बाजार से लेकर आता तो मुझे गुड़िया है याद आती , कैसे वो गेट पर आते ही मेरा सामान मेरे हाथ से ले लिया करती । जब भी बाजार में रखे हुए अंगूर देखता तो मुझे गुड़िया याद आती क्योंकि उसे अंगूर बहुत पसंद थे । फिर अपने आपको समझाता पागल हो गया है क्या रामेश्वर ? तूने अपनी जीवन भर की कमाई क्या इसलिए खर्च की है कि तेरी बेटी अंगूर के लिए तरसे ।उसे किस बात की कमी। हर मौके पर मुझे उसकी याद आती शायद वो भी मुझे इतना ही याद करती होगी ।
हां दिखाती नहीं है । जब घर आती , तो मैं छुपकर उसे संतुष्टि से 5 , 10 मिनट पहले देखता था । उसका चेहरा पढ़ता । वो खुश तो है ना । उसकी मुस्कुराहट में जैसे मैं उसकी यादों को भुला देना चाहता था , पर न जाने क्यों ? उसे देख कर लगता है बहुत कमजोर हो गई है । कई बार मैंने उससे पूछा , अपने पास प्यार से बिठाकर बेटा कुछ कमजोर लग रही हो तो उसने बनावटी हंसी हंसते हुए कहा ," पापा ये तो फैशन है जो जितना पतला होगा उतना ही ज्यादा सुंदर दिखेगा ।"
और कमजोर और उदास और गंभीर वो दिन पर दिन होती चली गई और फैशन का मुखौटा पहना कितनी आसानी से उसने मुझे पागल बना दिया । मैं कैसे नहीं देख पाया उसके दर्द को ।आज मेरी गुड़िया मेरे सामने वाले कमरे में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है । उसने अपने बाप से पैसा मांगने की बजाय खुद को फांसी लगाना ज्यादा बेहतर समझा । यहां तक कि अपने करीबी दोस्त को भी मना कर दिया , उसके पापा तक ये बात ना पहुंचे की ससुराल में वो कैसे रहती है ? क्यों नहीं आई वो मेरे पास । वो जो हर चीज के लिए मेरे पास आती थी । उसने क्यों नहीं कहा , पापा मुझे इस नर्क से निकाल लो ।मैं उसे कभी नहीं रहने देता वहां । चाहे मैं खुद बिक जाता , पर मैं उसे वहां से निकाल लेता । क्या करूंगा मैं उसके लिए अब लड़कर जब वो नहीं रहेगी ? मैं हर बड़ी से बड़ी लड़ाई लड़ता उसके लिए उसने क्यों नहीं समझा मुझे इस लायक । पुलिस के फोन से पहले काश उसका फोन आया होता ,"पापा अब मैं इस घुटन में नहीं जी सकती " तो मैं उसे समझाता बेटा मैं हूं ना । जब तक मैं हूं , तब तक दुनिया में कोई ऐसा दुख नहीं है जो तुम्हें छू सके । वो क्यों भूल गई कि उसके पापा अलादीन के चिराग हैं!
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