Thursday, December 11, 2014

इंसाफ कहां है?

भारत में बड़ी संख्या में मुसलमान युवा जेलों में बंद हैं।
इनमें से बहुत से युवाओं को न्याय मिलने में सालों-साल
लग जाते हैं। उन्हें भले ही आखिरकार बेगुनाह करार दे
दिया जाए, लेकिन उनके जीवन के अहम साल जेल में
खत्म हो जाते हैं।
किसी का करियर डूब जाता है, तो किसी का परिवार
बिखर जाता है। सालों बाद जब वे अपने घर वापस आते
हैं तब तक जिंदगी पूरी तरह पटरी से उतर
चुकी होती है। पुरानी दिल्ली के मोहम्मद आमिर खान
पायलट बनकर अपने करियर में ऊंची उड़ान
भरना चाहते थे। मगर उनके सपनों की उड़ान वक्त से
पहले जमीन पर आ गई। 14 सालों तक जेल में रहने के
बाद अब आमिर टूट चुके हैं।
आमिर उस शाम को आज भी नहीं भूले हैं, जब
वो अपनी मां के लिए दवा लेने घर से निकले थे।
उनका कहना है कि उसी दौरान पुलिस ने उन्हें रास्ते से
ही पकड़ लिया था। आमिर तब 18 साल के थे। बाद में
उन पर बम धमाके करने, आतंकी साजिश रचने और
देश के खिलाफ युद्ध करने जैसे संगीन आरोप लगाए
गए।
18 साल की उम्र में आमिर 19 मामलों में उलझ गए थे।
उनके सामने थी एक लंबी कानूनी लड़ाई। 1998 में शुरू
हुई उनकी कानूनी जंग 2012 तक चली और आखिरकार
फरवरी 2012 में अदालत ने उन्हें बेगुनाह करार दिया।
वे सभी मामलों में बरी कर दिए गए।
जेल में आमिर के 14 साल ही नहीं बीते, बल्कि उनके
सारे सपने भी चकनाचूर हो गए। जब वो जेल से निकले
तो उनके पिता का निधन हो चुका था। सदमे में
डूबी उनकी मां अब कुछ बोल नहीं पाती हैं।
उनकी आवाज हमेशा के लिए चली गई है। मगर
इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी देश की न्याय
व्यवस्था से उनका भरोसा नहीं टूटा है।
आमिर का कहना है निर्दोष करार दिए जाने के बाद
जेल में कटे उनके जीवन के अनमोल सालों की भरपाई
आखिर कौन करेगा। वो अपनी जिंदगी को नए सिरे से
शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं, मगर सवाल है उनके
पुनर्वास की जिम्मेदारी कौन लेगा? आमिर के मुताबिक
वे तमाम नेताओं के साथ-साथ राष्ट्रपति से भी मिल
चुके है, मगर किसी से उन्हें आश्वासनों के अलावा कुछ
नहीं मिला।
आमिर जैसे कई और नौजवान हैं, जिन्हें कई सालों तक
जेल में रहने के बाद अदालत ने बेगुनाह पाया। नेशनल
क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के
मुताबिक भारत के कुल कैदियों में 28.5
फीसदी कैदी विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों से संबंध
रखते हैं। जबकि देश की आबादी में
इनकी हिस्सेदारी मात्र 20 फीसदी है।
जेलों में बंद धार्मिक अल्पसंख्यकों की बात की जाए
तो दिसंबर 2013 तक 19.7 फीसदी मुसलमान जेलों में
बंद हैं। सिख समुदाय के 4.5 फीसदी लोग जेलों में बंद
हैं, ईसाई समुदाय के 4.3 फीसदी लोग जेलों में बंद हैं।
आंकड़े यह भी बताते हैं कि 5.4 फीसदी मुसलमान, 1.6
फीसदी सिख और 1.2 फीसदी ईसाई कैदियों पर
ही आरोप तय हो पाया है। वहीं 14 फ़ीसदी मुसलमान,
2.8 फ़ीसदी सिख और 3 फीसदी ईसाई कैदी फिलहाल
अंडरट्रायल हैं।
बेगुनाहों की रिहाई के लिए बने संगठन रिहाई मंच के
संस्थापक व लखनऊ में रहने वाले एडवोकेट शोएब इस
समय उत्तर प्रदेश की अदालतों में उन छह
मामलों को देख रहे हैं, जिनमें करीब एक दर्जन नौजवान
जेलों में बंद हैं। ये सारे मामले आंतकवाद से जुड़े हुए हैं।
वो बताते हैं कि जिन मामलों को वो देख रहे थे उनमें से
दो मामलों में चार नौजवान बाइज्जत रिहा हो गए हैं।
लेकिन उनकी जिंदगी के अहम सात साल जेल में
ही निकल गए।
शोएब बताते हैं कि चर्चित और विवादित खालिद
मुजाहिद और हकीम तारिक का भी केस वही देख रहे हैं।
इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने निमेष आयोग
का गठन किया। आयोग ने इस मामले में गिरफ्तार
दोनों मुस्लिम नौजवानों को निर्दोष बताया। खालिद
मुजाहिद की पुलिस ट्रायल के दौरान मौत हो गई। मौत
की वजह साफ नहीं है, लेकिन हकीम तारिक एक दूसरे
मामले में जेल में बंद है।
23 नवंबर, 2007 में उत्तर प्रदेश के तीन
शहरों लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी में एक ही दिन
25 मिनट के भीतर सिलसिलेवार धमाके हुए थे, जिनमें
18 लोग मारे गए। इन्हीं धमाकों में खालिद मुजाहिद
और हकीम तारिक को गिरफ्तार किया गया था। इन्हें
पुलिस रिकार्ड में 22 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के
बाराबंकी जिले से गिरफ्तार दिखाया गया। हालांकि,
इनके परिवार वालों का दावा है कि इन्हें 12 दिसंबर
को उठाया गया था।
मायावती सरकार ने 14 मार्च 2008 को खालिद
मुजाहिद और हकीम तारिक़ के ‘आतंकवादी गतिविधियों’
में शामिल होने की जांच के लिए आयोग का गठन
किया था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 31 अगस्त 2012
को पेश की। सितंबर महीने में आयोग की रिपोर्ट
को अखिलेश सरकार ने विधानसभा की पटल पर
स्वीकार किया।
मानवाधिकार कार्यकर्ता और हाल में आई पुस्तक
‘काफ्का लैंड’ की लेखिका मनीषा सेठी कहती हैं, “देश
का क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम ही गरीबों व
अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ है। पुलिस व जांच
एजेंसियां निष्पक्ष नहीं हैं। आप देखेंगे कि मुसलमान
20-20 साल जेलों में रह रहे हैं और उसके बाद अदालत
उन्हें निर्दोष बताती है। हम सबको इस पर जरूर
सोचना चाहिए।”
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स से
जुड़े अखलाक़ अहमद का आरोप है कि प्रशासन करप्ट
होने के साथ-साथ सांप्रदायिक भी है। अखलाक अहमद
साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट के एक खास केस
का जिक्र करते हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस
एचएल दत्तू और जस्टिस सीके प्रसाद
की दो सदस्यीय बेंच ने गुजरात के शहर अहमदाबाद में
साल 1994 के आतंकवादी कार्रवाई के एक केस में 11
अभियुक्तों को ये कहते हुए बरी कर दिया कि कानून
इस बात की इजाजत नहीं देता कि किसी शख्स
को उसके धर्म के आधार पर सताया जाए।
एनसीआरबी के मुताबिक साल 2013 के अंत तक करीब
20 हजार मुसलमान उत्तर प्रदेश के विभिन्न जेलों में
बंद थे। वहीं पश्चिम बंगाल में करीब 10 हजार
मुसलमान जेलों में थे।
(पुलिस मुठभेड़ पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश)
डिटेंशन (हिरासत) के मामले में गुजरात सबसे आगे है,
उसके बाद तमिलनाडु का नंबर है। एनसीआरबी के
आंकड़े बताते हैं कि जेल की कुल आबादी का 65
फीसदी कैदी एसटी(अनुसूचित जनजाति),
एससी(अनुसूचित जाति) व ओबीसी(अन्य पिछड़ा वर्ग)
हैं। इनमें एससी 21.7 फीसदी, एसटी 11.5 फीसदी और
ओबीसी 31.6 फीसदी हैं।
मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार बताते हैं, “ये
जातियां हिन्दुस्तान में पिछड़ी व गरीब हैं। इनके साथ
सरकारें सामाजिक व आर्थिक न्याय नहीं कर रही हैं।
ये ही सबसे अधिक अन्याय के शिकार हैं। जो अपने
हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं, वही जेलों में हैं।”
अन्य देशों में भी यही हाल
हिमांशु कुमार के मुताबिक ऐसा सिर्फ भारत में
ही नहीं है, बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी यही हाल
है। अमरीका के जेलों में ज्यादातर काले और मजदूर
ही बंद हैं। पिछले दिनों बाजार में आई ‘कलर्स ऑफ
केज’ के लेखक अरुण फरेरा का कहना है, “जो शोषित
तबका है, पुलिस उसी का शोषण करती है और
जो बड़ा है, वो जेल के भीतर भी बड़ा है।”
फरेरा मानते हैं कि समाजशास्त्रीय तरीके से देखा जाए
तो अपराध करने, कराने के पीछे इनकी आर्थिक
विपन्नता भी एक कारण हो सकती है। तिहाड़ जेल के
वेलफेयर ऑफिसर चरण सिंह जेल में बढ़ती आबादी,
खासकर दलितों व मुस्लिमों की आबादी, के पीछे कई
सारे कारण गिनाते हैं। चरण सिंह बताते हैं, “अशिक्षा,
गरीबी,बेरोज़गारी, बड़े परिवार, लोगों में कई तरह के
अंधविश्वास, लोगों की संगत, समाज में असमानता,
एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ इत्यादि अहम कारण
हैं। कानून को लागू करने में भेदभाव
भी इसकी बड़ी वजह है।”

Tuesday, November 18, 2014

व्यंग्य

व्यंग्य: ...पर ये पोर्न देखता कौन है?
14 November, 2014
शरद ऋतु का आगमन हो चला था. मटर, निर्गुण ब्रह्म, और
अच्छे दिन अब भी आम
आदमी की पहुंच से बाहर थे.
लौकी-करेले की कोपलें छप्पर-
छानी को और गोभी के दाम आसमान को छू
रहे थे. बोरोप्लस के अभाव में नवजातों के कोमल गाल परपराना शुरू
हो गए थे.
सयानों के जोड़ों का दर्द करवट मारने लगा और जवान सुबह
की गुलाबी ठण्ड से बचने को लिहाफों में
दुबके थे. ऐसी ही एक सुबह आशु मुनि,
परमपूज्य साहिलेश्वर का किवाड़ खटखटा रहे थे. साहिलेश्वर ने
चीकट हो चुकी रजाई को एक ओर
लतिआया और रात भर में मुंह पर जम चुके लार को पोंछते हुए
दरवाजा खोला. दरवाजा खुलते ही आशु मुनि चरणों पर
लोट पड़े.
साहिलेश्वर ने रूखा सा आशीर्वाद फेंकते हुए पूछा, 'अब
कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा?'
आशु मुनि उवाचे, 'प्रभु अर्ली मॉर्निंग
की जिज्ञासा है, ये गुलाबी ठण्ड क्या होवे
है?'
साहिलेश्वर झल्लाए, 'अबे मॉर्निंग मोरोन सिर्फ इतना पूछने तो तुम
इतनी ठण्ड में आए नहीं हो कम टू द
पॉइंट ड्यूड, सीधे-सीधे बको!
क्या पूछना है?'
आशु मुनि- अब का कहें, सुबह-सुबह बड़े हर्ष का समाचार
मिला प्रभु. सुना है भारत सरकार सारी पोर्न साइट्स पर
ताले लगाने जा रही है.
साहिलेश्वर- पर हर्ष तो कहीं झलक
नहीं रहा है तुम्हारे थोबड़े पर?
आशु मुनि– प्रभो! लेग पुलिंग मत कीजिये न
प्लीज, बात तो पूरी सुनिए देन टेल
मी समथिंग.
साहिलेश्वर तब तक दातून चबा चुके थे. मुंह पोंछते हुए बोले–
ओक्के, ओक्के पिनपिनाओ नहीं,सवाल दागो.
आशु मुनि- सवाल नहीं बड़ा संशय है महाराज. संशय
भी क्या समस्या है, ये पोर्न साइट्स देखता कौन है?
साहिलेश्वर कैजुअली बोले– तुम देखते होगे बे.
आशु मुनि– प्रभूऊऊ...समस्या विकट है आप समझ
नहीं रहे हैं. हम जैसों को तो दिनभर एंजल प्रिया से
चैटियाने से फुर्सत नहीं मिलती. बाद में
स्कूल-कॉलेज के टंटे, फिर इधर
देखा भी तो हॉलीवुड की कोई
पिच्चर टोरेंट पर डाउनलोड लगा सो जाते हैं. बाकी बाजार
भाव आप को पता है सैकड़ों रुपयों में रत्ती भर
डाटा मिलता है. इंसान पोर्नियाए कि व्हाट्सएप, हाइक,
वी-चैट के मैसेज पढ़े चुल्लू भर डाटा में.
साहिलेश्वर– रे मूढ़मति तो तेरी समस्या क्या है?
एन्जल प्रिया, महंगा इन्टरनेट, हॉलीवुड
की फिलिम या पोन्नोगिराफी सीधे
बताओ, काहे अतना खदबदाय रहे हो?
आशु मुनि- हे चैतन्यनेटप्रतापी चिर3Gधर,
मॉलवेयरहर्ता, वायरसविनाशक,
त्रिब्राउजरधारी साहिलेश्वर महाराज समस्या ये है
कृपानिधान कि हम तो हो गए व्यस्त करने में समय नष्ट, अब कौन
माई का लाल रह गया पोर्न देखने को, है कौन वो पथभ्रष्ट?
साहिलेश्वर- बहुत हैं, बहुत हैं...एक तुम
ही तो अकेले
नहीं हो ठरकी दुनिया में.
आशु मुनि- तात यही तो पेच है.
बाकी इंटरनेट के जंगलों में जो मिलते हैं,
वो बड़ी ऊंची चीज हैं,
या तो धर्मरक्षक हैं या किसी दल के दल...
साहिलेश्वर- शटअप, आगे मत बोलना, समझ गया मैं
तुम्हारी शंका, इसका समाधान है मेरे पास,
गीगाबाइटों स्पेक्ट्रम के निचोड़ से प्राप्त ज्ञान का ये
सार अब जो मैं कहता हूं, उसे कान खोल कर सुनो और ये
बत्तीसी चियारना बंद करो बे..
(इसके बाद साहिलेश्वर स्थिर और गंभीर
वाणी में बोले) बालक इन्टरनेट के अरण्य में विचरण
करते हुए अब तक तुम्हें जो भी जीव-
जंतु मिले होंगे वो बुद्धूजीवी रहे होंगे.
‘फलां धर्म खतरे में है’ रेंकने वाले धर्मरक्षक,
नहीं तो ‘हम लाएंगे पूर्ण स्वराज वाया ढिकाना दल’ वाले
‘दलिद्र’ या कुछ शिकारी प्राणी जिन्हें हैकर
कहते हैं. लेकिन ठरकपन कौन कब तक दबा पाया है? अन्दर से
तो वैसे ही हैं न! सामने न
सही Incognito Mode पर तो बेचारे खुद
का सामना करते हैं. जो सुदेसी-
सुदेसी अलापते हैं, वो दूसरी टैब पर नौ-
घटी अमेरिका हो आते हैं. जिन्हें तुम सोचते
हो इतिहास बनाएंगे, वो इतिहास मिटाते रह जाते हैं. सुबह चाय में
बिस्कुट बाद में डुबोएंगे, कुकीज पहले साफ करेंगे.
और ये पढ़ाई का रोना न रोया करो, हर जगह जो कम पढ़े हैं
वो भी 'I understand and wish to continue'
को छोड़ Cancel नहीं दबाते.
आशु मुनि- अच्छा तो चक्कर ये है. ये पूर्ण स्वराज के झंडाबरदार
पोर्न स्वराज की ओर मुंह मारते हैं, लेकिन देव अब
सरकार जब ताले जड़ देगी तब क्या होगा इनका?
साहिलेश्वर– देखते जाओ, पूरक विचारों की बाढ़ आने
वाली है, जो दुखी होंगे वो सरकार के कदम
पर स्तुतिगान करते नजर आएंगे. सभ्यता बच गई, धर्म
की विजय हुई, नारी का सम्मान लौट आया,
बालमन पर बुरे असर न होंगे ईटीसी, कुछ
जो ज्यादा तिलमिला जाएंगे, वो ‘इससे तो व्यभिचार और बढ़ेंगे’ बकरते
दिखेंगे.
आशु मुनि– बेहतर है प्रभु, देखते हैं आगे.
वही कहूं कि महंगाई के जमाने में तो लम्पटई
भी बस पैसे वाला ही कर सकता है.
साहिलेश्वर- ठीक है, बहुत
जनकवियों की भाषा न बोलो, अच्छा सुनो आज घर से
निकलने का मूड नहीं है. टेशन तरफ जाना तो सरस
सलिल लिए आना...और ये फोन छोड़ो बे
हमारा हिस्ट्री भी डिलीट न
किएं हैं अभी.

Friday, November 7, 2014

हिंदी डोमेन

यदि आपको हिन्दी में वेबसाइट नेम लेना है
तो यही शानदार मौका है, क्योंकि ये अब
बेहद सस्ती कीमत पर
उपलब्ध कराए जा रहे हैं। अब 15 अगस्त से मात्र
350 रूपए कि अपना हिन्दी वेबसाइट डोमेन
ले सकते है।
नेशनल इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया के
सीईओ गोविन्द क ा ने कहा है कि अब 15
अगस्त ये 350 रूपए के शुल्क के साथ
हिन्दी डोमेन नेम उपलब्ध कराए जा रहे
हैं। इस योजना को अप्रूवल के लिए उच्च
अथॉरिटीज को भेजा जा चुका है।
हालांकी हिन्दी डोमेन नेम लेने
वालो के लिए यह जान लेना जरूरी है कि इस
के वेबसाइट नेम डॉट कॉम, डॉट नेट या फि र डॉट जैसे टॉप
लेवल डोमने नेम के साथ उपलब्ध नहीं क
राए जा रहे हैं।
बताया गया है कि हिन्दी डोमेन के लिए "डॉट
भारत" एक्सटे ंसन दिया जा रहा है।
इतना ही नहीं बल्कि लोगो को 250
रू पए के शुल्क में भी सब डोमेन नेम
उपलब्ध कराए जाएंगे।
गौरतलब है कि इससे पहलेवेबसाइट का नाम सिर्फ
अंग्रेजी स्क्रिप्ट अथवा लेटर्स में
ही बुक कराया जा सकता था, लेकिन अब
हिन्दी में डोमेन नेम बुक होने पर
देशी भाषाओं में कंटेंट क्रिएशन में
बढ़ावा होगा।

Thursday, October 30, 2014

स्त्री

Please Read This....
A Lady's Simple Questions & Surely It Will
Touch A Man's heart...
------------------------
देह मेरी ,
हल्दी तुम्हारे नाम की ।
हथेली मेरी ,
मेहंदी तुम्हारे नाम की ।
सिर मेरा ,
चुनरी तुम्हारे नाम की ।
मांग मेरी ,
सिन्दूर तुम्हारे नाम का ।
माथा मेरा ,
बिंदिया तुम्हारे नाम की ।
नाक मेरी ,
नथनी तुम्हारे नाम की ।
गला मेरा ,
मंगलसूत्र तुम्हारे नाम का ।
कलाई मेरी ,
चूड़ियाँ तुम्हारे नाम की ।
पाँव मेरे ,
महावर तुम्हारे नाम की ।
उंगलियाँ मेरी ,
बिछुए तुम्हारे नाम के ।
बड़ों की चरण-वंदना
मै करूँ ,
और 'सदा-सुहागन' का आशीष
तुम्हारे नाम का ।
और तो और -
करवाचौथ/बड़मावस के व्रत भी
तुम्हारे नाम के ।
यहाँ तक कि
कोख मेरी/ खून मेरा/ दूध मेरा,
और बच्चा ?
बच्चा तुम्हारे नाम का ।
घर के दरवाज़े पर लगी
'नेम-प्लेट' तुम्हारे नाम की ।
और तो और -
मेरे अपने नाम के सम्मुख
लिखा गोत्र भी मेरा नहीं,
तुम्हारे नाम का ।
सब कुछ तो
तुम्हारे नाम का...
Namrata se puchti hu?
आखिर तुम्हारे पास...
क्या है मेरे नाम का?
एक लड़की ससुराल चली गई।
कल की लड़की आज बहु बन गई.
कल तक मौज करती लड़की,
अब ससुराल की सेवा करना सीख गई.
कल तक तो टीशर्ट और जीन्स
पहनती लड़की,
आज साड़ी पहनना सीख गई.
पिहर में जैसे बहती नदी,
आज ससुराल की नीर बन गई.
रोज मजे से पैसे खर्च करती लड़की,
आज साग-सब्जी का भाव करना सीख गई.
कल तक FULL SPEED स्कुटी चलाती लड़की,
आज BIKE के पीछे बैठना सीख गई.
कल तक तो तीन वक्त
पूरा खाना खाती लड़की,
आज ससुराल में तीन वक्त
का खाना बनाना सीख गई.
हमेशा जिद करती लड़की,
आज पति को पूछना सीख गई.
कल तक तो मम्मी से काम करवाती लड़की,
आज सासुमां के काम करना सीख गई.
कल तक भाई-बहन के साथ
झगड़ा करती लड़की,
आज ननद का मान करना सीख गई.
कल तक तो भाभी के साथ मजाक
करती लड़की,
आज जेठानी का आदर करना सीख गई.
पिता की आँख का पानी,
ससुर के ग्लास का पानी बन गई.
फिर लोग कहते हैं कि बेटी ससुराल
जाना सीख
गई.
(यह बलिदान केवल लड़की ही कर
सकती है, इसिलिए
हमेशा लड़की की झोली
वात्सल्य से भरी रखना...)
बात निकली है तो दूर तक जानी चाहिये!!!
शेयर जरुर करें और लड़कियो को सम्मान दे!

Wednesday, October 29, 2014

आप

मेरे कुछ सवाल है केजरीवाल से...
आप अपनी ईमानदारी अपने पास
ही क्यो नही रखते?
जब बेईमान ही देश चलाने का ठेका रखते है...
तो आपको क्या हक है बार बार उन पर ऊँगली उठाने
का
भाजपा 32 लोगो के साथ संख्या कम के कारण सरकार
नही बना पाई
अब 29 के कारण बनाना चाहती है
क्योंकि मोदी सरकार के नियम मे 29 नम्बर 32 से
ज्यादा है
आज भाजपा गरीबी खत्म करने के लिये
कुछ लोगो को पैसे देकर खरीदना चाहती है
तो आप उनकी अमीरी मे
क्यों रुकावट बन रहे है आपको क्या हक है?
अगर आपके कारण भाजपा कांग्रेस एक हो रहे है तो आपको उस
एकता मे बाधक नही बनना चाहिये आखिरकार देश
को चलाने का अधिकार केवल इन 2 पार्टीयो का है..
राब्रट वाड्रा देश के जीजा है अगर उनका सम्मान
भाजपा भी करती है ओर कोई
कार्यवाही नही कर
रही तो आप का फर्ज
नही बनता कि आप भी ऊनका सम्मान
करे..
जब हर राजनीतक दुसरे राजनीतक के
साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर खडा है ओर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर
देश
की अखण्डता को तोडना नही चाहता तो आप
को क्या हक है?
ऐसे देशभक्त जिनको देश की अत्यंत समझदार
जनता ने वोटों से चुना है उनको लोकपाल से जेल
भिजवाना क्यो चाहते है? और आपको सोई हुई
जनता की नींद खराब करने का हक किसने
दिया?
जो लोग पैसे लेकर बाहर के देशो मे भाग गये
और आप सरकार से भाग गये पर आपका पाप उन लोगो से बडा है
पर आप समझते ही नही..
एक पर्सनल बात
आप अपने बच्चो को इतना पढा क्यूं रहे है जबकि देश के
लोगो का विशवास मोदी ओर समृति ईरानी मे
है जो कम पढे लिखे है आप इस बात का ख्याल रखे और
बच्चो का राजनीतक भविष्य पढाई मे खराब मत करें..
लोगो की याददाशत बहुत कमजोर होती है
आपके अच्छे दिन हम भुल चुके है ओर अब हमे एक बात हर
चैनल के जरीये याद कराई जाती है
कि अच्छे दिन आने वाले है...
पर आपके पास पैसे ही नही है कोई
चैनल खरीदने के लिए
जब आप पैसे खाते ही नही तो हमे
क्या खिलायोगे सो अपनी सोच बदलो...
आपने 84 पर SIT बना दी पर लोग सज्जन कुमार से
ज्यादा जूडे है
लोगो मे डर पैदा करो प्यार
नहीं क्योंकि भारतीय
उन्ही के आगे झुकते है जो झुकाना जानता है
सो केजरी जी आप
लोगो की भलाई नही बेडा गर्क कर रहे
है..
आप जैसा आपका एक मूर्ख समर्थक

Friday, October 24, 2014

मन की आवाज़

Very lovely message.... must read
बहुत साल बाद दो दोस्त रास्ते में मिले .
धनवान दोस्त ने उसकी आलिशान
गाड़ी पार्क की और
गरीब मित्र से बोला चल इस गार्डन में बेठकर
बात करते है .
चलते चलते अमीर दोस्त ने गरीब दोस्त से
कहा
तेरे में और मेरे में बहुत फर्क है .
हम दोनों साथ में पढ़े साथ में बड़े हुए
मै कहा पहुच गया और तू कहा रह गया ?
चलते चलते गरीब दोस्त अचानक रुक गया .
अमीर दोस्त ने पूछा क्या हुआ ?
गरीब दोस्त ने कहा तुझे कुछ आवाज सुनाई
दी?
अमीर दोस्त पीछे मुड़ा और पांच
का सिक्का उठाकर बोला
ये तो मेरी जेब से गिरा पांच के सिक्के
की आवाज़ थी।
गरीब दोस्त एक कांटे के छोटे से पोधे
की तरफ गया
जिसमे एक तितली पंख फडफडा रही थी .
गरीब दोस्त ने उस तितली को धीरे से बाहर
निकला और
आकाश में आज़ाद कर दिया .
अमीर दोस्त ने आतुरता से पुछा
तुझे तितली की आवाज़ केसे सुनाई दी?
गरीब दोस्त ने नम्रता से कहा
" तेरे में और मुझ में यही फर्क है
तुझे "धन" की सुनाई दी और मुझे "मन"
की आवाज़ सुनाई दी .
"यही सच है "
.इतनी ऊँचाई न देना प्रभु कि,
धरती पराई लगने लगे l
इनती खुशियाँ भी न देना कि,
दुःख पर किसी के हंसी आने लगे ।
नहीं चाहिए ऐसी शक्ति जिसका,
निर्बल पर प्रयोग करूँ l
नहीं चाहिए ऐसा भाव कि,
किसी को देख जल-जल मरूँ
ऐसा ज्ञान मुझे न देना,
अभिमान जिसका होने लगे I
ऐसी चतुराई भी न देना जो,
लोगों को छलने लगे ।
: खवाहिश नही मुझे
मशहुर होने की।
आप मुझे पहचानते हो
बस इतना ही काफी है।
अच्छे ने अच्छा और
बुरे ने बुरा जाना मुझे।
क्यों की जीसकी जीतनी
जरुरत थी उसने उतना ही
पहचाना मुझे।
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा
भी कितना अजीब है,
शामें कटती नहीं, और साल
गुज़रते चले जा रहे हैं....!
एक अजीब सी
दौड़ है ये ज़िन्दगी,
जीत जाओ तो कई
अपने पीछे छूट जाते हैं,
और हार जाओ तो अपने
ही पीछे छोड़ जाते हैं।.....

Tuesday, October 21, 2014

विकी डोनर

युवराज की खुराक किसी बड़े
बॉडीबिल्डर की तरह है.
चंडीगढ़ का यह बांका जवान मानो मिस्टर यूनिवर्स
का खिताब जीतने की तैयारी कर
रहा है. हर रोज 20 लीटर दूध पीता है,
5 किलो सेब खाता है और 15 किलो पोषक खाना खाता है.
उसकी लंबाई 14 फुट और ऊंचाई 5 फुट 9 इंच है.
गठे हुए शरीर वाला युवराज सीना तानकर
चलता है और उसकी चाल में गजब का रौब दिखता है.
देशभर के अमीर किसान चाहते हैं कि युवराज उनके
यहां आकर रहे. उसे बड़े लाड-प्यार से पालने वाले
चंडीगढ़ किसान करमवीर सिंह
का कहना है कि एक व्यक्ति ने 7 करोड़ रुपये का ऑफर दिया था,
लेकिन वे अपने बेटे का सौदा नहीं कर सकते.
पढ़िए: दूध बेचकर करोड़पति बनने वालों के बारे में
जिस मुल्क में 60
फीसदी ग्रामीण हर रोज मात्र
35 रुपये कमाते हैं, वहां युवराज के पिता उसके खाने-
पीने पर हर रोज करीब 900 रुपये कैसे
खर्च कर देते हैं? दरअसल, युवराज बहुत कमाऊ पूत है.
करमवीर सिंह का कहना है कि वे
उसकी बदौलत साल में करीब 50 लाख
रुपये कमा लेते हैं.
यानी करमवीर हर रोज करीब
14,000 रुपये युवराज से कमाते हैं. लेकिन इसके लिए उनके बेटे
को खास मेहनत
नहीं करनी होती. वह
इतनी बढिय़ा खुराक की बदौलत हर रोज
3.5 से 5 एमएल
बढिय़ा क्वालिटी का सीमेन तैयार करता है,
जिसे डायल्यूट करके 35 एमएल सीमेन तैयार
किया जाता है. गर्भाधान के लिए 0.25 एमएल सीमेन
की जरूरत होती है और इसके लिए कोई
भी किसान 1,500 रुपये हंसी-
खुशी देने को तैयार रहता है.
इस तरह अगर युवराज के कुल सीमेन
का सौदा किया जाए तो हर रोज करमवीर को 2,10,000
रुपये मिल सकते हैं. ऐसे में इस दूसरे 'विकी डोनर'
को करमवीर मात्र 7 करोड़ रुपये में भला क्यों बचेंगे.
वैसे, यह बता दें कि 'विकी डोनर' युवराज 1,400
किलो का मुर्रा भैंसा है, जिसकी मां हर रोज 25
किलो दूध देती थी और
इसकी वजह से उसके सीमेन
की जबरदस्त मांग है.