Saturday, July 27, 2013
शहर के सबसे बडे बैंक में एक बार एक बुढिया आई । उसने मैनेजर से कहा - "मुझे इस बैंक मे कुछ रुपये जमा करने हैं" । मैनेजर ने पूछा - कितने हैं, वृद्धा बोली - होंगे कोई दस लाख। मैनेजर बोला - वाह क्या बात है, आपके पास तो काफ़ी पैसा है, आप करती क्या हैं ? वृद्धा बोली - कुछ खास नहीं, बस शर्तें लगाती हूँ । मैनेजर बोला - शर्त लगा-लगा कर आपने इतना सारा पैसा कमाया है ? कमाल है... वृद्धा बोली - कमाल कुछ नहीं है बेटा, मैं अभी एक लाख रुपये की शर्त लगा सकती हूँ कि तुमने अपने सिर पर विग लगा रखा है । मैनेजर हँसते हुए बोला - नहीं माताजी मैं तो अभी जवान हूँ, और विग नहीं लगाता । तो शर्त क्यों नहीं लगाते ? वृद्धा बोली । मैनेजर ने सोचा यह पागल बुढिया खामख्वाह ही एक लाख रुपये गँवाने पर तुली है, तो क्यों न मैं इसका फ़ायदा उठाऊँ... मुझे तो मालूम ही है कि मैं विग नहीं लगाता । मैनेजर एक लाख की शर्त लगाने को तैयार हो गया । वृद्धा बोली - चूँकि मामला एक लाख रुपये का है इसलिये मैं कल सुबह ठीक दस बजे अपने वकील के साथ आऊँगी और उसी के सामने शर्त का फ़ैसला होगा । मैनेजर ने कहा - ठीक है बात पक्की... मैनेजर को रात भर नींद नहीं आई.. वह एक लाख रुपये और बुढिया के बारे में सोचता रहा । अगली सुबह ठीक दस बजे वह बुढिया अपने वकील के साथ मैनेजर के केबिन में पहुँची और कहा, क्या आप तैयार हैं ? मैनेजर ने कहा - बिलकुल, क्यों नहीं ? वृद्धा बोली- लेकिन चूँकि वकील साहब भी यहाँ मौजूद हैं और बात एक लाख की है अतः मैं तसल्ली करना चाहती हूँ कि सचमुच आप विग नहीं लगाते, इसलिये मैं अपने हाथों से आपके बाल नोचकर देखूँगी। मैनेजर ने पल भर सोचा और हाँ कर दी, आखिर मामला एक लाख का था। वृद्धा मैनेजर के नजदीक आई और धीर-धीरे आराम से मैनेजर के बाल नोचने लगी। उसी वक्त अचानक पता नहीं क्या हुआ, वकील साहब अपना माथा दीवार पर ठोंकने लगे । मैनेजर ने कहा - अरे.. अरे.. वकील साहब को क्या हुआ ? वृद्धा बोली - कुछ नहीं, इन्हें सदमा लगा है, मैंने इनसे पाँच लाख रुपये की शर्त लगाई थी कि आज सुबह दस बजे मैं शहर से सबसे बडे बैंक के मैनेजर के बाल दोस्ताना माहौल में नोचकर दिखाऊँगी। इसलिये बूढों को कभी कम ना समझें.....`
Thursday, July 25, 2013
व्यक्ति का नजरिया वृद्ध व्यक्ति ने अपने गाँव में नए व्यक्ति को देखा जिज्ञासावश पूछा - आप श्रीमान कौन हैं ? मैं आपके गाँव के पोस्ट ऑफिस में नया कर्मचारी हूँ. वृद्ध ने पूछा : आप कहाँ रहते हैं ? आपके सामने वाले मकान में, आपके परिवार में कौन कौन हैं ? मैं हूँ,पत्नी हैं,मेरे दो बच्चे हैं, बूढी माँ हैं उसको हमने अपने पास ही रख लिया हैं । कुछ समय पश्चात फिर एक नया व्यक्ति गाँव में दिखाई दिया वृद्ध ने जिज्ञासा शांत करने के लिए पूछा - आप श्रीमान कौन हैं? मैं आपके गाँव के स्कूल में अध्यापक हूँ वृद्ध ने पूछा आप कहाँ रहते हैं ? आपके पास वाले मकान में आपके परिवार में कौन कौन हैं? मैं हूँ , मेरी माँ हैं , मेरी पत्नी हैं, हमारे दो बच्चे हैं _ हम अपनी माँ के पास रहते हैं ।। संकलित- विद्यालयीन पत्रिका
गुड़िया कृष्णा अस्पताल में खड़ा ईश्वर से अपनी माँ और तीन वर्षीय छोटी गुड़िया जैसी बहन रानी की जिंदगी लिए प्रार्थना कर रहा था . कल तक उसकी दुनिया सपनों से भरी थी . पिता थे नहीं,कृष्णा और माँ काम करके गुजारा कर रहे थे . कृष्णा माँ से कहता - " माँ मैं तो पढ़ नहीं सका,पर मैं खूब काम करूँगा और रानी को स्कूल भेजूंगा,उसे खूब पढ़ाऊंगा ताकि उसे घर-घर काम न करना पड़े ." वह जब भी स्कूल के सामने से निकलता और वहां छोटे-छोटे बच्चों को स्कूल यूनिफार्म में कन्धों पर किताबों का बैग लटकाए देखता ,उसे कल्पना में रानी भी यूनिफार्म पहने स्कूल जाती दिखाई देती . माँ जहाँ काम पर जाती थी रानी ने वहां बच्चों को गुड़िया से खेलते देखा तबसे वह कृष्णा से कहती - " भैया, मुझे भी गुड़िया ला कर दो न,मैं भी गुड़िया का ब्याह रचाउंगी . " तबसे कृष्णा थोड़े-थोड़े पैसे जमा कर रहा था ताकि वह रानी को गुड़िया दिला सके . लेकिन कल सुबह जब माँ रानी के साथ सड़क पार कर रही थी अचानक एक ट्रक तेजी से आया और दोनों को टक्कर मारता निकल गया . माँ और रानी लहुलुहान गए . लोग जमा हो गए और दोनों को तुरंत अस्पताल पहुँचाया . डॉक्टर ने बताया दोनों की हालत चिंताजनक है . कृष्णा रात भर सीता चाची के साथ अस्पताल में बैठा रहा . सुबह डॉक्टर साहब जैसे ही रूम से बाहर निकले सीता चाची तुरंत डॉक्टर साहब के पास गई . डॉक्टर साहब बोले - " मुझे खेद है मैं रानी को नहीं बचा पाया ." " और रानी की माँ ? " " वो भी अंतिम साँसें गिन रही है . " कृष्णा सीता चाची से लिपट फूट-फूट कर रो पड़ा. रानी उसे छोड़ कर चली गई और माँ भी जीवन- मृत्यु के बीच झूल रही थी. वह रानी को एक गुड़िया तक दिला नहीं पाया . मुठ्ठी में रखी पचास की नोट पसीने में भीग रही थी . उसने तो सोचा था रानी के होश में आते ही वह उसे एक प्यारी सी गुड़िया ला कर देगा . अब तो रानी नहीं रही और माँ भी उसे हमेशा के लिए छोड़ कर जा रही है . तभी कृष्णा ने सीता चाची से कहा - " चलो चाची मुझे तुरंत दुकान ले चलो . " चाची हैरान रह गई . इतनी दुखद घड़ी में भी कृष्णा क्या खरीदना चाह रहा था ? कृष्णा सीता चाची को दूकान ले गया . दूकान में जाकर उसने एक प्यारी सी गुड़िया पसंद की और दुकानदार को उसे पैक करने को कहा . सीता चाची हैरानी से बोली - " कृष्णा तुम किसके लिए गुड़िया खरीद रहे हो ? " कृष्णा की आँखों से झर-झर आंसू बह रहे थे . वह बोला - " चाची, रानी मुझसे बार-बार गुड़िया मांगती रही लेकिन मैं उसे कभी गुड़िया नहीं दिला पाया . अभी थोड़े-थोड़े करके पैसे जमा किए थे और सोच ही रहा था कि उसे गुड़िया दिलाऊं कि यह हादसा हो गया . रानी तो भगवान् के घर चली गई और अब माँ भी रानी के पास जा रही है . ये गुड़िया मैं अब माँ के हाथ में दूंगा . वह जरूर यह गुड़िया रानी के पास पहुंचा देगी . " कहते-कहते कृष्णा ने कसकर गुड़िया को अपने नन्हे से सीने से चिपका लिया . कृष्णा और सीता चाची की आँखों से बहते आंसुओं की श्रद्धांजलि भी शायद गुड़िया अपने साथ ही ले जाने वाली थी .. . . .
Wednesday, July 24, 2013
“अबे, कहाँ घुसा आ रहा है?”सिर से पाँव तक गंदे भिखारीनुमा आदमी से अपने कपड़े बचाता हुआ वह लगभग चीख सा पड़ा। उस आदमी की दशा देखकर मारे घिन्न के मन ही मन वह बुदबुदाया-कैसे डिब्बे में चढ़ बैठा। अगर अर्जेंसी न होती तो कभी भी इस डिब्बे में न चढ़ता, भले ही ट्रेन छूट जाती। माँ के सीरियस होने का तार उसे तब मिला, जब वह शाम सात बजे आफिस से घर लौटा। अगले दिन, राज्य में बंद के कारण रेलें रद्द कर दी गई थीं, और बसों के चलने की भी उम्मीद नहीं थी। अत: उसने रात की आखिरी गाड़ी पकड़ना ही बेहतर समझा। एक के बाद एक स्टेशन पीछे छोड़ती ट्रेन आगे बढ़ी जा रही थी। खड़े हुए लोग आहिस्ता- आहिस्ता नीचे फर्श पर बैठने लग गए थे। कई अधलेटे-से भी हो गए थे। “जाहिल! कैसी गंदी जगह पर लुढ़के पड़े हैं! कपड़ों तक का ख्याल नहीं है।” नीचे फर्श पर फैले पानी और संडास के पास की दुर्गन्ध और गन्दगी के कारण उसे घिन्न आ रही थी. किसी तरह भीड़ में जगह बनाते हुए आगे बढ़कर उसने डिब्बे में अंदर की ओर झांका। अंदर तो और भी बुरा हाल था। असबाब और सवारियों से खचाखच भरे डिब्बे में तिल रखने की जगह नहीं थी। आगे बढ़ना असंभव देख वह वहीं खड़े रहने की विवश हो गया। उसने घड़ी देखी, साढ़े दस बज रहे थे-रात के। सुबह छह बजे से पहले गाड़ी क्या लगेगी दिल्ली ! रात-भर यहीं खड़े-खड़े यात्रा करनी पड़ेगी-वह सोच रहा था। ट्रेन अंधकार को चीरती आगे बढ़ती जा रही थी। खड़ी हुई सवारियों में से दो-चार को छोड़कर शेष सभी नीचे फर्श पर बैठ गई थीं और आड़ी- तिरछी होकर सोने का उपक्रम कर रही थीं। “जाने कैसे नींद आ जाती है इन्हें!” वह फिर बुदबुदाया। ट्रेन जब अम्बाला से छूटी तो उसकी टाँगों में दर्द होना आरम्भ हो गया था। नीचे का गंदा- गीला फर्श उसे बैठने से रोक रहा था। वह किसी तरह खड़ा रहा और इधर-उधर की बातों को याद कर, समय को गुजारने का प्रयत्न करने लगा। कुछ ही देर बाद, उसकी पलकें नींद के बोझ से दबने लगीं। वह आहिस्ता-आहिस्ता टाँगों को मोड़कर बैठने को हुआ, लेकिन तभी अपने कपड़ों का ख़याल कर सीधा तनकर खड़ा हो गया। पर खड़े-खड़े झपकियाँ जोर मारने लगीं और देखते-देखते वह भी संडास की दीवार से पीठ टिकाकर गंदे और गीले फर्श पर अधलेटा- सा हो गया। किसी स्टेशन पर झटके से ट्रेन रूकी तो उसकी नींद टूटी। मिचमिचाती आँखों से उसने देखा-डिब्बे में चढ़ा एक व्यक्ति एक हाथ में ब्रीफकेस उठाए, आड़े-तिरछे लेटे लोगों के बीच से रास्ता बनाने की कोशिश कर रहा था। उसके समीप पहुँचकर उस व्यक्ति ने उसे यूँ गंदे-गीले फर्श पर अधलेटा-सा देखकर नाक- भौं सिकोड़ी और बुदबुदाता हुआ आगे बढ़ गया,’जाहिल ! गंदगी में कैसे बेपरवाह पसरे पड़े हैं !’
स्थान:bhopal madhya pradesh
Industrial Area, Mandideep
कल जब कुछ देशभक्त हुतात्मा चन्द्र शेखर आज़ाद और बालगंगाधर तिलक काजन्मदिन मना रहे थे,तब इलेक्ट्रोनिक मीडिया इंग्लैंड के राजकुमार के जन्म की खुशियाँ मना रहा था, मीडिया वालों ने उस अंगेज के बच्चे के शरीर के अलग-अलग हिस्सों का वजन तक बता दिया,पर किसी भी न्यूज़ चैनल नेँ जो खुद को संविधान का चौथा स्तम्भ बताते फिरते है,एक पल के लिए भी नहीं बताया की 23 जुलाई को हिंदुस्तान बचाने वाले क्रांतिवीरों का जन्म हुआ था। प्रधानमंत्री कार्यालय सेलेकर संसद भवन के किसी भी गलियारे में आज़ाद और तिलक का जिक्र नहीं हुआ। 23 मार्च को भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था और चम्बल के किनारे पर बैठकर एक कविता लिखी थी, जिसकी दो पंक्तिया आज सटीक बैठती है- "हँसते-हँसते जो फाँसी वाले तख्तों पर झूल गए, हमें हनी सिंह याद रहा पर भगत सिंह को भूल गए।" agar meri bat se sehmat ho to share jarur kare jai hind,
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