अखबार पढ़ती जिंदगी ।
मेरी शादी इण्टर में पढ़ते वक्त ही तय हो गयी थी । इण्टर के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए कलकत्ता आ गया । यहां का माहौल मैंने बहुत ही अद्भुत पाया था । यहां प्रार्थना करने की झंझट नहीं थी । कक्षा अटैंड करने की भी कोई खास जरूरत नहीं थी । मन आए तो अटेंड करो । न मन आए तो जय राम जी की बोलो । केवल कक्षा में आवश्यक उपस्थिति दर्ज हो इसका ध्यान रखना पड़ता था । हम लड़के लड़कियों का एक ग्रुप बन गया था ,जो हर पल साथ रहता था । पिक्चर , पिकनिक का अक्सर प्रोग्राम बनता रहता था । हंसी खुशी का माहौल था । हम खुश तो पूरी कायनात खुश । जिंदगी पढ़ रही थी , साथ में ऐश भी कर रही थी ।
मेरी बी ए की डिग्री पूरी हो गयी । घर वालों का दबाव शादी के लिए बढ़ा । मैं टाल मटोल करने लगा । मुझे इस माहौल से निकलकर शादी के घुटन भरे माहौल में जीना अच्छा नहीं लगा । मेरी होने वाली पत्नी ग्रामीण परिवेश की थी । सिर में सरसों तेल चुपड़ने वाली । काली मिट्टी से बाल धोने वाली । उसे शेम्पू व शिकाकाई की तहजीब कहां से आती ? फिर भी मैंने इंकार नहीं किया । मैं अपनी माता पिता को दुःखी नहीं करना चाहता था । बहाना बनाया । नौकरी लगने के बाद शादी करुंगा । घर वाले इस बात पर राजी हो गये । नौकरी भी मिल गयी । अब कोई बहाना नहीं था । फिर भी मैंने बहाना बनाया कि अभी ठीक से जम जाऊँ तब शादी करुंगा । मैं बहाना इसलिए बनाता जा रहा था कि तंग आकर लड़की वाले इस रिश्ते को तोड़ दें । पर वे इंतजार करना जानते थे । इसलिए वे मेरे हर बहाने को सच मानकर चल रहे थे ।
आखिरकार मुझे कहना पड़ा कि मुझे उस अनपढ़ गंवार से शादी नहीं करनी है । यह लड़की मेरी ख्वाबों की मल्लिका नहीं है । मेरे माता पिता के लिए यह असह दुःख था । लड़की वालों का भी दुःख चरम पर था । मैं भी क्या करता ? मेरी जिंदगी नरक न बन जाए , इसके लिए यह करना जरुरी था । अब मैं और बहाने नहीं बना सकता था । आर पार की लड़ाई लड़नी थी । मैंने लड़ी । जीत भी हासिल की , पर इस जीत में कितने मन के महल ढहेंगे इसका अनुमान मुझे नहीं था । पिता हार्ट के रोगी । माँ ने खटिया पकड़ ली । लड़की के घर वालों ने भाग दौड़ की । कहीं से खोज बीन की । सस्ता महंगा नहीं देखा । बेटी की शादी कर दी । मुझे पता चला तो मैंने चैन की साँस ली थी । पिता दवाई के आसरे रहे । मां की जिंदगी भी घसीट रही थी । एक दिन दोनों काल कवलित हो गये थे ।
इसके बाद मेरे जीजा ने कई जगह रिश्ते देखे । हर रिश्ते में कुछ न कुछ कमी होती । मैं शत प्रतिशत की तलाश में था । मेरी इच्छा " ऊंचे दावा दीजिए , राम पुरावे आस " वाली थी । मैं मिस्टर परफेक्शनिस्ट था , पर खुद मैं जब शत प्रतिशत नहीं था तो मुझे शत प्रतिशत कहां मिलता ?इस बात का इल्म मुझे नहीं था । जब इस बात का पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी । मेरे साथ के सभी लड़के लड़कियों की शादी हो चुकी थी । कई पिता भी बन चुके थे । हम आज भी मिलते थे । अब भी पिक्चर पिकनिक का प्रोग्राम बनता था । मैं अनमने ढंग से उसमें शामिल होता । एक बार पिकनिक का प्रोग्राम बना । खाने पीने से पहले गंगा में स्टीमर से घूमने का प्रोग्राम था । खाने पीने का इतना सारा सामान भांडे बर्तन लेकर स्टीमर में जाया नहीं जा सकता था । किसी महिला ने हंसते हुए सुझाव दिया कि सुरेश जी छड़े मलंग हैं । ये जाकर क्या करेंगे ? सारा समान यहीं छोड़ो । ये चौकीदारी करेंगे । बात हल्के फुल्के ढंग से कही गयी थी , पर उसका असर दिल तक पहुँचा था ।
मेरी उम्र रेत की मानिंद जिंदगी के हाथों फिसल रही थी । एक दिन दीदी का फोन आया । उन्होंने बताया कि एक लड़की परित्यक्ता है । उसके माँ बाप उसकी दूसरी शादी करना चाहते हैं । तुम आकर लड़की देख लो । तुम्हारे हां कहने पर ही आगे की बात चलेगी । मैंने अपना मन बनाया । और दीदी के यहां जाने के लिए गाड़ी पकड़ ली । रात को दीदी के घर पहुँचा । खाना खाया । सो गया । सुबह तड़के नहा धोकर बैठ गया । दीदी चाय ले आईं । चाय पीते पीते पूछा - दीदी , आपने मुझे लड़की देखने के लिए बुलाया था । दीदी की आवाज बहुत मद्धम थी । उसमें बहुत कुछ उदासी का पुट था । " लड़की वाले कह रहे हैं कि लड़के की उम्र बहुत ज्यादा है "। उस समय मैं अखबार पढ़ रहा था । मैंने अखबार को ऊपर खिसका लिया । चेहरा ढक लिया ताकि दीदी मेरे मनोभावों को न पढ़ सकें ।
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