Friday, February 15, 2019

Shaheed

शर्मिंदा हूँ मेरे मादर ए मुल्क ...मेरी जान हिन्दुस्तान ...कि मैं आज सिपाही नही सिर्फ एक छुट्भैय्या कहानीकार हूँ  ।।।।।।।

उम्मत ए रसूल करबला में सामने से लड़ी थी ....

छुप कर पीठ पीछे से सर यजीद के लश्कर ने उतारा था ।।

मेरी बेबाकी मुझे गालियाँ नजर करती है ...और जो आज सरहद पार वालों ने नजर किया है उसको कोई हिजड़ा बहादुरी कहे तो समझ लेना तुमने आलम ए इस्लाम और अपने दायरे में नामर्द और गद्दार पैदा करने शुरू कर दिए है ....

ये गद्दार तब भी थे जब रसूल दुनिया में जिस्म लिए मौजूद थे ...ये अब भी हैं जब आप जिस्म से हमारे बीच नही .....

इनसे हर दौर हमने जंग लड़ी है .... याद करो हजरत हुसैन  को करबला में दाढ़ी ..टोपी वाले  .. ...हाफिज ..कारियों  आलिमों ..और मुबललिगों ने  ही शहीद किया था ....

आज तुम उन्हें मुसलमान नही बोल सकते क्यूँकि वो खूनी थे ...कातिल थे ...गद्दार और एहसान फरामोश ..नमकहराम और उम्मत ए रसूल पर गहरा स्याह दाग थे ....

तो आज अगर किसी ने सरहद पार वाले इन दहशतगर्दो  को मुसलमान कहा तो उसने रसूल के बनाम अपनी उम्मत चुन ली ....

हश्र ए मशहर फैसला करेगा ...कि रसूल की उम्मत से खिलवाड़ ...उनके दीन का नाम और मिजाज खराब करना ...उनकी सुन्नत का मख़ौल उड़ाकर ..अपना इस्लाम बनाना और उसे थोपना ...कुरआन हदीस का गलत तर्जुमा कर लोगों को बम ..बन्दूक से बदलने... के एवज में तुम्हे क्या मिलता है ....

लेकिन मुल्कपरस्ती इस्लाम का एक बुनयादी शुमार है .....और अपनी जमीन ..अपने ओहदे से मुहब्बत करबला का फ़लसफ़ा .....

मैं उस इस्लाम से खुद को अलग करता हूँ जिसकी कार का स्टीयरिंग कट्टरपन्थ के हाथों में हैं ...मैं उस इस्लाम का नुमाइंदा हूँ जहाँ रसूल का अखलाक और वतनपरस्ती जगमगाती है .....

पुलवामा में ..बेटा .. भाई ..पति खोई हर माँ-बहन को मेरा जवाब कि अति के बात अंत सुनुश्चित है ....

मेरा यकीन कीजियेगा ...कि शहीद ठेठ मर्द होते हैं ...और बेशहीद नामर्द पीठ पीछे से घात लगाकर वार करने वाले  .....

और यकीन ये भी कीजियेगा ...हूरें शहीदों के हिस्से आती हैं ...न कि बुजदिल और कायरों के ....

यकीन कीजियेगा शहीद हमेशा ज़िंदा रहते हैं ...और उन्हें हलाक करने वालों को तो ये जमीन भी उगल देती है ....

यकीन कीजियेगा आप के बेटे ..भाई और शौहर पूरे मुल्क के बाशिंदों की आँख भिगो गए ....और इनकी बदनाम कब्रो पर कोई कुत्ता भी टांग  उठा दे तो मेरा गिरेबां आपके हाथों में ....

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

Wednesday, February 13, 2019

'घास नीली है।'

गधे ने बाघ से कहा, 'घास नीली है।' बाघ ने कहा, 'घास हरी है।'
फिर दोनों के बीच चर्चा तेज हो गई। दोनों ही अपने-अपने शब्दों में दृढ़ हैं। इस विवाद को समाप्त करने के लिए, दोनों जंगल के राजा शेर के पास गए।

पशु साम्राज्य के बीच में, सिंहासन पर बैठा एक शेर था। बाघ के कुछ कहने से पहले ही गधा चिल्लाने लगा। "महाराज, घास नीला है ना?" शेर ने कहा, 'हाँ! घास नीली है। '

गधा, 'ये बाघ नहीं मान रहा। उसे ठीक से सजा दी जाए। 'राजा ने घोषणा की,' बाघ को एक साल की जेल होगी। राजा का फैसला गधे ने सुना और वह पूरे जंगल में खुशी से झूम रहा था। बाघ को एक साल की जेल की सजा सुनाई गई। '

बाघ शेर के पास गया और पूछा, 'क्यों महाराज! घास हरी है, क्या यह सही नहीं है? 'शेर ने कहा,' हाँ! घास हरी है। 'बाघ ने कहा,' ... तो मुझे जेल की सजा क्यों दी गई है? '

सिंह ने कहा, “आपको घास नीले या हरे रंग के लिए सजा नहीं मिली। आपको उस मूर्ख गधे के साथ बहस करने के लिए दंडित किया गया है। आप जैसे बहादुर और बुद्धिमान जीव ने गधे से बहस की और निर्णय लेने के लिए मेरे पास आये।”

कहानी का सार .... ....
2019 में अपना वोट सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार को दें .... बस गधों से बहस न करें अन्यथा आपको अगले 5 साल तक की सजा हो जाएगी। 😅😂🤣 🙏🏻💐

Saturday, February 9, 2019

अखबार पढ़ती जिंदगी

अखबार पढ़ती जिंदगी ।

मेरी शादी इण्टर में पढ़ते वक्त ही तय हो गयी थी । इण्टर के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए कलकत्ता आ गया । यहां का माहौल मैंने बहुत ही अद्भुत पाया था । यहां प्रार्थना करने की झंझट नहीं थी । कक्षा अटैंड करने की भी कोई खास जरूरत नहीं थी  । मन आए तो अटेंड करो । न मन आए तो जय राम जी की बोलो । केवल कक्षा में आवश्यक उपस्थिति दर्ज हो इसका ध्यान रखना  पड़ता था । हम लड़के लड़कियों का एक ग्रुप बन गया था ,जो हर पल साथ रहता था । पिक्चर , पिकनिक का अक्सर प्रोग्राम बनता रहता था । हंसी खुशी का माहौल था । हम खुश तो पूरी कायनात खुश । जिंदगी पढ़ रही थी , साथ में ऐश भी कर रही थी ।

मेरी बी ए की डिग्री पूरी हो गयी । घर वालों का दबाव शादी के लिए बढ़ा । मैं टाल मटोल करने लगा । मुझे इस माहौल से निकलकर शादी के घुटन भरे माहौल में जीना अच्छा नहीं लगा । मेरी होने वाली पत्नी ग्रामीण परिवेश की थी । सिर में सरसों तेल चुपड़ने वाली । काली मिट्टी से बाल धोने वाली । उसे शेम्पू व शिकाकाई की तहजीब कहां से आती ? फिर भी मैंने इंकार नहीं किया । मैं अपनी माता पिता को दुःखी नहीं करना चाहता था । बहाना बनाया । नौकरी लगने के बाद शादी करुंगा । घर वाले इस बात पर राजी हो गये । नौकरी भी मिल गयी । अब कोई बहाना नहीं था । फिर भी मैंने बहाना बनाया कि अभी ठीक से जम जाऊँ तब शादी करुंगा । मैं बहाना इसलिए बनाता जा रहा था कि तंग आकर लड़की वाले इस रिश्ते को तोड़ दें । पर वे इंतजार करना जानते थे । इसलिए वे मेरे हर बहाने को सच मानकर चल रहे थे ।

आखिरकार मुझे कहना पड़ा कि मुझे उस अनपढ़ गंवार से शादी नहीं करनी है । यह लड़की मेरी ख्वाबों की मल्लिका नहीं है । मेरे माता पिता के लिए यह असह दुःख था । लड़की वालों का भी दुःख चरम पर था । मैं भी क्या करता ? मेरी जिंदगी नरक न बन जाए , इसके लिए यह करना जरुरी था । अब मैं और बहाने नहीं बना सकता था । आर पार की लड़ाई लड़नी थी । मैंने लड़ी । जीत भी हासिल की , पर इस जीत में कितने मन के महल ढहेंगे इसका अनुमान मुझे नहीं था । पिता हार्ट के रोगी । माँ ने खटिया पकड़ ली । लड़की के घर वालों ने भाग दौड़ की । कहीं से खोज बीन की । सस्ता महंगा नहीं देखा ।  बेटी की शादी कर दी । मुझे पता चला तो मैंने चैन की साँस ली थी । पिता दवाई के आसरे रहे । मां की जिंदगी भी घसीट रही थी । एक दिन दोनों काल कवलित हो गये थे ।

इसके बाद मेरे जीजा ने कई जगह रिश्ते देखे । हर रिश्ते में कुछ न कुछ कमी होती । मैं शत प्रतिशत की तलाश में था । मेरी इच्छा " ऊंचे दावा दीजिए , राम पुरावे आस " वाली थी । मैं मिस्टर परफेक्शनिस्ट था , पर खुद मैं जब शत प्रतिशत नहीं था तो मुझे शत प्रतिशत कहां मिलता ?इस बात का इल्म मुझे नहीं था । जब इस बात का पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी । मेरे साथ के सभी लड़के लड़कियों की शादी हो चुकी थी । कई पिता भी बन चुके थे । हम आज भी मिलते थे । अब भी पिक्चर पिकनिक का प्रोग्राम बनता था । मैं अनमने ढंग से उसमें शामिल होता । एक बार पिकनिक का प्रोग्राम बना । खाने पीने से पहले गंगा में स्टीमर से घूमने का प्रोग्राम था । खाने पीने का इतना सारा सामान भांडे बर्तन लेकर स्टीमर में जाया नहीं जा सकता था । किसी महिला ने हंसते हुए सुझाव दिया कि सुरेश जी छड़े मलंग हैं । ये जाकर क्या करेंगे ? सारा समान यहीं छोड़ो । ये चौकीदारी करेंगे । बात हल्के फुल्के ढंग से कही गयी थी , पर उसका असर दिल तक पहुँचा था ।

मेरी उम्र रेत की मानिंद जिंदगी के हाथों फिसल रही थी । एक दिन दीदी का फोन आया । उन्होंने बताया कि एक लड़की परित्यक्ता है । उसके माँ बाप उसकी दूसरी शादी करना चाहते हैं । तुम आकर लड़की देख लो । तुम्हारे हां कहने पर ही आगे की बात चलेगी । मैंने अपना मन बनाया । और दीदी के यहां जाने के लिए गाड़ी पकड़ ली । रात को दीदी के घर पहुँचा । खाना खाया । सो गया । सुबह तड़के नहा धोकर बैठ गया । दीदी चाय ले आईं । चाय पीते पीते पूछा - दीदी , आपने मुझे लड़की देखने के लिए बुलाया था । दीदी की आवाज बहुत मद्धम थी । उसमें बहुत कुछ उदासी का पुट था । " लड़की वाले कह रहे हैं कि लड़के की उम्र बहुत ज्यादा है "। उस समय मैं अखबार पढ़ रहा था । मैंने अखबार को ऊपर खिसका लिया । चेहरा ढक लिया ताकि दीदी मेरे मनोभावों को न पढ़ सकें ।

एकता

ज़रा गौर फरमाइये -
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मन तडपत हरी दर्शन को आज
गीतकार : शकिल बदायुनी
गायक : मोहम्मद रफी
संगीतकार : नौशाद
फिल्म  : बैजू बावरा (1952)
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इंसाफ का मंदिर है, ये भगवान का घर है
गायक  -मोहम्मद रफी
संगीत : नौशाद अली
गीतकार : शकील बदायुनी
फिल्म -अमर (1954)
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हे रोम रोम में बसने वाले राम
गीतकार : साहिर लुधियानवी
गायक : आशा भोसले,  रफी
फिल्म  : नीलकमल (1968)
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ओ पालनहारे निर्गुण और न्यारे
गीतकार - जावेद अख्तर
संगीतकार :A. R. Rahman
फिल्म - लगान (2001)
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जय रघुनन्दन जय सियाराम
गायक: मोहम्मद रफ़ी
गीतकार: शकील बदांयुनी
फिल्म -घराना (1961)
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आना है तो आ राह में
गीतकार - साहिर लुधियानवी
संगीत  - ओ पी नय्यर, खैयाम साहब
गायक - मोहम्मद रफ़ी
फिल्म - नया दौर (1957)
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जान सके तो जान, तेरे मन में छुपे भगवान
गीतकार - जान निसार अख्तर
संगीत - ओ पी नय्यर
गायक - मोहम्मद रफी
फिल्म - उस्ताद (1957)
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शायद काफी समझ आगया होगा ??
अगर नहीँ, तो
सुनिए
बीबीसी ने पुरी दुनिया में रहने वाले 30 लाख हिंदुओं पर एक सर्वे कराया था कि हिंदुओं का सबसे प्रिय भजन कौन सा है ? इस सर्वे से जो परिणाम निकल कर सामने आया, वह करारा जबाब है उन धर्म के ठेकेदारों का जो हिन्दु मुस्लिम एकता के बीच दीवार खड़ी करते हैं ! 30 लाख हिंदुओं ने जिन 10 भजनों का चयन किया उनमें से 6 'शकील बदायुनी' के लिखे हुए हैं, और 4 'साहिर लुधियानवी' के लिखे हुए हैं ! उन 10 के 10 भजनों में संगीत हैं 'नौशाद साहब' का ! उन सभी 10 भजनों को आवाज़ दिया हैं 'रफी साहब' ने ! ये 10 भजन 'महबूब अली खान' की फिल्मों में हैं, और इन 10 भजनों पर अभिनय किया हैं 'यूसुफ खान' उर्फ दिलीप कुमार ने !
यह जानकारी वर्तमान समय में जरुरी थी क्योंकि  चुनावों में साम्प्रदायिकता  कि आग लगाकर भाईचारे को रौंदती धार्मिक उन्माद की हवा जो लोग आज चला रहे हैं उन्हें यह जानना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता की भावना भारतीयों के नस-नस में रची बसी है और उसे साम्प्रदायिकता की हवाओं के झोंको से उड़ाया नहीं जा सकता  !           कृपया सामप्रदायिक दुष्चक्र फैलाने वाले दुराचारीयों को समझे ।

दहेज एक अभिशाप


मोहल्ले में रहने वाली दो लडकियों मीना और
सोनाली की शादी एक ही दिन तय हुई, मीना गरीब
घर की लड़की थी उसके पिताजी एक छोटे किसान थे,
जबकि सोनाली अमीर घराने की लड़की थी उसके
पिताजी का कारोबार कई शहरो में फैला था!
शादी वाले दिन मै भी पडोसी होने के नाते काम में
हाथ बटाने सोनाली के घर गया, घर पंहुचा ही था की
सोनाली के पिता जी लगे अपने रहीसी बताने
वो बोले हमारा होने वाला दामाद सरकारी डॉक्टर
है, खानदानी अमीर है पर हम भी कहा कम है
२० लाख नकद एक कार और सब सामान दे रहे है दहेज़ में !
मैंने कहा ताऊ जी जब वो इतने अमीर है तो आप ये सब
उन्हें क्यों दे रहे हो उनके पास तो ये सब पहले से
होगा ही, वो बोले अगर ना दू तो बिरादरी मे नाक
कट जाएगी पर तू ये सब नहीं समझेगा तू अभी छोटा है,
खैर शाम को बारात आ गई मै खाना खाने के बाद
मीना के घर की तरफ जाने लगा आखिर
उसकी भी तो शादी है ! उसके घर के बहार भीड़
लगी थी मगर ना कोई गाना, ना कोई डांस,
ना किसी के चेहरे पर मुस्कान, घर के और करीब जाने पर
चीख-पुकार का करुण रुदन मेरे कानो को सुनाई दिया,
किसी अनहोनी की आशंका से मेरे दिल जोरो से धडकने
लगा, घर के अन्दर का द्रश्य देखकर मेरे पैरो के नीचे से
जमीन निकल गई!
मीना के पिताजी अब इस दुनिया में नहीं थे! वो दहेज़
में दी जाने वाली रकम का इन्तेजाम नहीं कर पाए
इसलिए लड़के वालो ने शादी से मना कर दिया, ये
सदमा वो बर्दास्त नहीं कर पाए और हिर्दय गति रुकने से
उनका देहांत हो गया !
ये दुःख की खबर सुनाने मै अपने घर पहुंचा,
अपनी माता जी से ये सब बता ही रहा था इतने में बड़े
भाई ने पीछे से आकर बताया के मीना ने
भी फासी लगाकर आत्महत्या कर ली है, वो अपने
पिताजी की मौत का कारण खुद को समझ
बैठी थी इसलिए शायद उसने यही ठीक समझा!!
दोस्तों दहेज़ प्रथा एक अभिशाप है, ना जाने
कितनी मौते इस दहेज़ प्रथा के कारण
होती है!
आप सब से आपके मित्र की विनती है, दहेज़ ना ले, और
ना दे !
आपका एक शेयर किसी की जिन्दगी बचा सकता है !!

Friday, February 8, 2019

The Rose

आज रोज डे है लेकिन गुलाब का मौसम तो पूरे बसंत रहता है या यूं कहिए पूरे साल। विज्ञान कहता है कि गुलाब की सुगंध में कुछ ऐसा है जो हमारे मूड को खुशमिजाज बनाता है। जरूर होता होगा जी वरना ऐसे ही गुलाब ने पूरी दुनिया में अपना खास मुकाम नहीं बनाया है। कहते हैं बीमार को सुगंधित गुलाब देना चाहिए और कोई रूठ जाए तो मनाने का आधा काम गुलाब ही कर देता है। लेकिन गुलाब का फूल सबसे अधिक वहां काम आता है जहां प्यार के इजहार की बात हो। सिर्फ एक गुलाब पेश कीजिए प्रेम की खुश्बू प्रेमिका के कानों तक न पहुंचे, मुमकिन नहीं। आज कल तो विरोध जताने के लिए भी लोग गुलाब पर ही भरोसा करने लगे हैं।

दरअसल, गुलाब सिर्फ सुगंधित फूल भर नहीं, जीने का सलीका भी है। वह गमले में भी खिल जाता है क्यारी में भी मगर उसकी मुस्कान और महक हर जगह कालजयी है। वह कभी नहीं मरती। तभी तो रामवृक्ष बेनीपुरी लिखते हैं-‘‘मानव को मानव बनाया गुलाब ने! मानव मानव तब बना जब उसने शरीर की आवश्यकताओं पर मानसिक वृत्तियों को तरजीह दी।’’

मानव ने जब गुलाब को जाना तभी उसने सौंदर्य को पहचाना। और यहीं से शुरू हुई होगी कला और जीवन में सौंदर्य की तलाश। वही कला जिसने हमें सभ्य बनाया, उंचा उठाया और बेहतरी की ओर निरंतर प्रयासरत होने का मार्ग सुझाया।

गुलाब हमारी मानसिक वृत्तियों का प्रतीक है। विनम्रता, अनुरोध, प्रेम सबका संबंध कहीं न कहीं गुलाब से है और आज के हिंसाग्रस्त दुनिया में गुलाब की अहमियत और बढ़ जाती है। गुलाब एक कोमल विचार है जिसे अपनाकर समाज, देश और अंत में पृथ्वी को बचाया जा सकता है। जिस दिन गुलाब पूरी दुनिया में राज करने लगेगा उस दिन हर जगह शांति होगी, मनुष्यता होगी। लेकिन जब तक गुलाब को एक फूल मानकर उसे गुलदस्तों में सजाते रहेंगे हिंसा जारी रहेगी और रोज डे आते-जाते रहेंगे।

-सरस्वती रमेश