भोपाल रेप पीड़िता का मीडिया को दिया गया बयान -
"चार दिन हो गये, मैं माता-पिता के साथ भटक रही हूँ। कभी बयान के लिये थाने तो कभी जाँच के लिये अस्पताल। पहले दिन एफआईआर दर्ज कराने के लिये संघर्ष करती रही। दूसरे दिन पुलिस ने बयान के लिये दिन भर थाने में बैठाकर रखा। तीसरे दिन मेडीकल और चौथे दिन मुझे सोनोग्राफी के लिये बुलाया गया। वही सवाल और वही जगह मेरे सामने बार-बार आ रही हैं। 'क्या हुआ था ? कहाँ हुआ था ? कितने लोग थे ? कैसे दिखते थे ? क्या बोल रहे थे ?' सवाल इतने कि जबाब देते-देते गले से आवाज निकलना बंद हो जाती, लेकिन उनके सवाल खत्म नहीं होते।
सिस्टम और पुलिस के खिलाफ अफसोस नहीं बल्कि गुस्सा है। हादसे के दिन एसआरपी अनिता मालवीय महिला होते हुये भी मजे लेती रहीं। वह मेरी कहानी सुनकर हंसती हैं, तो न्याय की उम्मीद कहाँ रह जाती है। पोस्ट पर तो छोड़ो वे पुलिस की वर्दी पहनने लायक नहीं हैं। मेरी इस लड़ाई में मेरे माता-पिता हर दम मेरे साथ हैं। उन्होंने मुझे संभाला और आरोपियों के खिलाफ लड़ने की हिम्मत दी।
उन दरिंदों के साथ रहम नहीं होना चाहिये। मैं गिड़गिड़ा रही थी। वे हंस रही थे। उन सभी को बीच चौराहे पर फाँसी दे देनी चाहिये। मेरी एक ही अपील है कि इस तरह की वारदात के बाद परिजनों को पीड़िता का साथ देते हुये आवाज उठाना चाहिये।"
रेप पीड़िता के लिये समाज और सिस्टम की निर्दयता और लापरवाही के फिल्मों में दिखाये दृश्य हमें अतिश्योक्ति लग सकते हैं, लेकिन वो हकीकत हैं आज भी। न हम बदले हैं न सिस्टम। रेप आज भी हमारे लिये तमाशा और चटकारे लेकर सुनाई जाने वाली कहानी है। म.प्र. की राजधानी के ये हाल हैं, तो बाकी जगह न जाने क्या होता होगा। महिलायें अपनी सुरक्षा खुद करें, हम नहीं सुधरेंगे।
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