My dream home
Friday, November 10, 2017
खुद की पहचान
*एक बच्चा जब 13 साल का हुआ तो उसके पिता ने उसे एक पुराना कपड़ा देकर उसकी कीमत पूछी।*
*बच्चा बोला 100 रु। तो पिता ने कहा कि इसे बेचकर दो सौ रु लेकर आओ। बच्चे ने उस कपड़े को अच्छे से साफ़ कर धोया और अच्छे से उस कपड़े को फोल्ड लगाकर रख दिया। अगले दिन उसे लेकर वह रेलवे स्टेशन गया, जहां कई घंटों की मेहनत के बाद वह कपड़ा दो सौ रु में बिका।*
*कुछ दिन बाद उसके पिता ने उसे वैसा ही दूसरा कपड़ा दिया और उसे 500 रु में बेचने को कहा।*
*इस बार बच्चे ने अपने एक पेंटर दोस्त की मदद से उस कपड़े पर सुन्दर चित्र बना कर रंगवा दिया और एक गुलज़ार बाजार में बेचने के लिए पहुंच गया। एक व्यक्ति ने वह कपड़ा 500 रु में खरीदा और उसे 100 रु ईनाम भी दिया।*
*जब बच्चा वापस आया तो उसके पिता ने फिर एक कपड़ा हाथ में दे दिया और उसे दो हज़ार रु में बेचने को कहा। इस बार बच्चे को पता था कि इस कपड़े की इतनी ज्यादा कीमत कैसे मिल सकती है । उसके शहर में मूवी की शूटिंग के लिए एक नामी कलाकार आई थीं। बच्चा उस कलाकार के पास पहुंचा और उसी कपड़े पर उनके ऑटोग्राफ ले लिए।*
*ऑटोग्राफ लेने के बाद बच्चे ने उसी कपड़े की बोली लगाई। बोली दो हज़ार से शुरू हुई और एक व्यापारी ने वह कपड़ा 12000 रु में ले लिया।*
*रकम लेकर जब बच्चा घर पहुंचा तो खुशी से पिता की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने बेटे से पूछा कि इतने दिनों से कपड़े बेचते हुए तुमने क्या सीखा ?बच्चा बोला - पहले खुद को समझो , खुद को पहचानो । फिर पूरी लगन से मन्ज़िल की और बढ़ो क्योकि जहां चाह होती है, राह अपने आप निकल आती है।'*
*पिता बोले कि तुम बिलकुल सही हो, मगर मेरा ध्येय तुमको यह समझाना था कि कपड़ा मैला होने पर इसकी कीमत बढ़ाने के लिए उसे धो कर साफ़ करना पड़ा, फिर और ज्यादा कीमत मिली जब उस पर एक पेंटर ने उसे अच्छे से रंग दिया और उससे भी ज्यादा कीमत मिली जब एक नामी कलाकार ने उस पर अपने नाम की मोहर लगा दी ।*
*तो विचार करें जब इंसान उस निर्जीव कपड़े को अपने हिसाब से उसकी कीमत बड़ा सकता है । तो फिर वो मालिक जिसने हम जीवों को बनाया है क्या वो हमारी कीमत कम होने देंगा ? जीवात्मा भी यहां आकर मैला हो जाता है लेकिन सतगुरु हम मैली जीवात्माओं को पहले साफ़ और स्वच्छ करते हैं, जिससे परमात्मा की नज़र में हम जीवात्माओं की कीमत थोड़ी बढ़ जाती है । फिर सतगुरु हम जीवात्माओं को अपनी रहनी के रंग में रंग देते हैं, फिर कीमत और ज्यादा बढ़ जाती है। और फिर सतगुरु हम पर अपने नाम की मोहर लगा देते हैं फिर तो इंसान अपनी कीमत का अंदाज़ा ही नही लगा सकता।*
*लेकिन अफ़सोस इतना कीमती इंसान अपने आप को कौड़ियों के दाम खर्च करते जा रहा है उसे अपने आप की ही पहचान नही , उसे अपने ऊपर लगी सतगुरु के नाम रूपी कृपा और उस अपार दया की कद्र नही, क्योकि अगर कद्र होती तो उसके☝ हुकुम में रहकर भजन बन्दगी को पूरा पूरा समय देकर अपने इंसानी जामे का मकसद और उसकी कीमत भी जरूर समझते ।*
Thursday, November 9, 2017
नोटबंदी की सच्चाई
नरेंद्र मोदी का शातिर फैसला
""""'''"""""""""""""""""""""""""""''""
मैं दो दिन तक खुश था कि भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का 1000 और 500 के नोट बंद करने का फैसला शानदार है,इस फैसले से काला धन बाहर निकल आएगा और भारत से भृष्टाचार समाप्त हो जायेगा कई बार मन हुआ कि प्रधानमंत्री जी को इस कार्य के लिए बधाई दूँ पर फिर मन में शंका हुई कि अगर परिणाम अच्छे होंगे तो बधाई बाद में भी दी जा सकती है, दिल से बधाई अपने आप ही निकल जाएगी ।
पर अफ़सोस कि श्री नरेंद्र मोदी का फैसला एक प्रधानमंत्री के नाते बिलकुल ही बकवास है पर हाँ एक राजनीतिज्ञ के नाते एक शातिर इंसान का फैसला है। मेरी तरफ से एक आम इंसान के नाते आपको प्रधानमंत्री चुनने पर पछतावा है पर एक राजनीतिक सोच के अनुसार आपके फैसले को सलाम।
आपने सबसे पहले उस इंसान का कर्जा चुकाया जिन्होंने लोकसभा चुनावों में आपके लिए हेलीकॉप्टर और चुनाव खर्च आपको और आपकी पार्टी को उपलब्ध करवाया सबसे पहले आम जनता का बीमा 12रूपये और 365 रूपये लेकर नए नियम बनाकर कई हज़ार करोड़ रूपये आपने रिजर्व बैंक से अडानी को ऋण के तौर पर उपलब्ध करवाये।
अम्बानी बंधु के पेट्रोल पम्प कई सालों से बंद पड़े थे क्योंकि विश्व बाज़ार में कच्चे तेल के भाव बढ़ जाने की वजह से अम्बानी बंधु को कच्चा तेल खरीद कर साफ करके बेचना महंगा पड़ रहा था और भारत सरकार सब्सिडी देकर भी तब डीज़ल 60रूपये और पेट्रोल 70 रूपये तक आम जनता को उपलब्ध करवा रही थी पर अम्बानी परिवार को पेट्रोल पंप बंद करने पड़े थे और इसे भाग्य ही कहिये कि आपके शासन में आते ही विश्व बाज़ार में कच्चे तेल के भाव 170डॉलर प्रति से घटकर 35डॉलर प्रति डॉलर हो गया फिर भी आपने आम जनता के लिए डीज़ल और पेट्रोल के भाव काम नहीं किये क्योंकि अम्बानी बंधुओं का अहसान जो उतारना था अब अम्बानी बंधू सस्ता कच्चा तेल खरीद कर महंगा बेच रहे है।
आपने उर्जित पटेल जो कि अम्बानी बंधू के जीजा जी है उनको RBI का गवर्नर बनाकर आपने तो अम्बानी बंधुओं के एहसान को उतारने का पूरा प्रयास किया है,क्योंकि उर्जित पटेल की बीवी अम्बानी परिवार से है तो गलती से ही सही उर्जित पटेल ने अपनी पत्नी से और उनकी पत्नी ने अपने मायके वाले अम्बानी बंधुओं से नए नोट छापने की चर्चा कर ली होगी तभी तो उन्होंने JIO में अपना सबकुछ निवेश कर दिया अब उनके पास तो कोई काला धन बचा ही नहीं है और ये इतेफाक है कि इस 1000 और 500 के नोट बंद होने से 2 महीने पूर्व ही हुआ। शायद मेरी बात सभी समझ गए होंगे।
Jio सिम मोबाइल सहित कम से कम 4000 रूपये में बेचा गया 130 करोड़ की जनसँख्या में से 50 करोड़ लोगों ने फ्री 4g डाटा की लालच में 50 करोड़ लोगों ने कम से कम सिम और मोबाइल खरीदे तो आप अंदाज़ा लगाएं 500000000×4000 =2000000000000 मोदी जी को हेलीकॉप्टर उपलब्ध करवाने वाले ने अपनी सारी सम्पति को वाइट कर दी इसी तरह केबिनेट के मंत्रियों और उनके सभी रिश्तेदारों ने और बड़े दिग्गज बीजेपी के नेताओं ने भी फैसले की जानकारी होने की वजह से अपनी सारी सम्पति को वाइट बना लिया। परेशान हुआ तो मात्र विपक्ष और मध्यम वर्ग का इंसान ये केसी देशभक्ति है??
मैं बुद्ध के एक वाक्य पर बहुत विश्वास करता हु कि "किसी पर विश्वास करने से पूर्व उस पर शक करो" और आपके इस फैसले पर मुझे शक हुआ कि कुछ तो गड़बड़ झाला है नोट बंद करने के पीछे आज जब सोशल मिडिया पर दो ख़बरें आयी कि उप्र बीजेपी नेता की बेटी के पास 2000 के नोटों की गड्डी है जिसके साथ उसने फोटो खिंचवाकर मेरे शक को मजबूती दी क्योंकि उप्र में 2017 में विधानसभा चुनाव है। और तमिलनाडु में 2000 के नोटों की अवैध खेप पकडा जाना मेरे शक को बल देते है। क्योंकि दोनों जगह विधानसभा चुनाव है। आप बीजेपी के मुखिया है और आपने अपने परिवार को बता दिया की आप क्या फैसला लेने वाले है। और जो भी बीजेपी के अहम लोगों के पास धन था वो 9/11/2016 की मध्यरात्रि से पूर्व काला धन नहीं रहा उसे परिवार के मुखिया के निर्देशानुसार सफ़ेद धन बना दिया गया। अब बात करते है उत्तरप्रदेश कि वहां बीजेपी के लोगों के पास तो नए रूपये बदला दिए गए है और विरोधी दल के लोगों को ये भनक भी नहीं थी कि जो गोदाम में 500 और 1000 के नोटों की भरी हुई बोरियां रखी है वो 9/11/2016 के बाद वो मात्र कागज़ के टुकड़े है। अब आपकी पार्टी वालों ने तो आपके निर्देशानुसार सारे नोटों को वाइट मनी बना दिया है इसका उदाहरण उप्र बीजेपी अध्यक्ष की पुत्री नलिनी मौर्य की फोटो जो मिडिया पर वायरल हुई है वो और तमिलनाडु में पकड़ी गयी खेप है क्योंकि अब तक तो 4000 रूपये से ज्यादा नोट निकलने की अनुमति नहीं है तो बीजेपी वालों के पास नोटों के बंडल कहाँ से आये?? कुछ तो गड़बड़झाला है।
आपकी पार्टी के लोगों के पास तो नए नॉट है जो आपने वाइट करवा दिए है पर विपक्षी पार्टी वाले बेचारे अपनी बोरी वाले नॉट बैंक भी नहीं ले जा सकते क्योंकि आपकी सरकार इंक्वारी बिठा देगी मुकदमे करवा देगी।। अब बीजेपी के सभी नेता सफ़ेद धन वाले हो गए है और विपक्ष वाले सब बोरों में रद्दी नोट भर कर बैठे है, अब उप्र और तमिलनाडु में रद्दी की बोरियों वाले आपका सामना कैसे कर सकते है??? आपके लोगों के पास नए नोट होंगे और विपक्ष वाले के पास तो वही पुराने नोट जो चल नहीं सकते। अब विपक्ष वाले बेचारे बैंक में भी जमा नहीं कर सकते 2.5 लाख से ज्यादा।। हुआ ना शातिर फैसला????
पर आपको ये फैसला लेने से पहले उन आम इंसानों के बारे में भी सोचना चाहिए था जिन्होंने आपको वोट देकर आपको इस पद पर पहुँचाया है। आप आज भारत के प्रधानमंत्री हो तो आम जनता की वजह से। नोट बंद करने से पूर्व आपको नए रुपयों को हर बैंक तक पहुँचाना था। मैं खुद आज एक दुकान पर गया मेरी जेब में 500 रूपये ही थे जिससे मुझे 200 रूपये का रसोई का सामान लेना था और 300 का मोटरसायकिल में पेट्रोल भरवाना था पर किराने वाले ने मुझसे एक ही शर्त रखी कि आटा चाहिए तो पूरा 500 का सामान लेना पड़ेगा और मुझे 500 रूपये का सामान लेना पड़ा और मुझे मोटरसायकिल वहीँ छोड़कर आना पड़ा। अम्बानी और अडानी तो सारा लेनदेन ऑनलाइन और चैक से करते है पर आपके इस फैसले से मारा तो बेचारा गरीब गया। आपको नोट बदलने थे तो सब जगह पहले बैंकों में 100रूपये और नए नोट की व्यवस्था करनी चाहिए थी। आपके आदेश और अव्यवस्था से लगता है कि आपका अपरिपक्व और बचकाना फैसला है। अगर जनता आपके इस फैसले की वजह जान गयी तो बीजेपी हमेशा के लिए लुप्त हो जायेगी और ना समझ पाए तो शायद आप फिर से जनता को मुर्ख बनाने में कामयाब हो जाओ।
Tuesday, November 7, 2017
भूख
भात दे हरामी: बांग्लादेश के कवि रफ़ीक आज़ाद की कविता
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ये कविता पढने के बाद देर तक आप इससे बाहर नहीं निकल पायेंगे.... यकीन न हो तो एक बार जरूर पढ़ें .....
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बेहद भूखा हूँ
पेट में , शरीर की पूरी परिधि में
महसूसता हूँ हर पल ,सब कुछ निगल जाने वाली एक भूख .
बिना बरसात के ज्यों चैत की फसलों वाली खेतों मे जल उठती है भयानक आग
ठीक वैसी ही आग से जलता है पूरा शरीर .
महज दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिले , बस और कोई मांग नहीं है मेरी .
लोग तो न जाने क्या क्या मांग लेते हैं . वैसे सभी मांगते है
मकान गाड़ी , रूपए पैसे , कुछेक मे प्रसिद्धि का लोभ भी है
पर मेरी तो बस एक छोटी सी मांग है , भूख से जला जाता है पेट का प्रांतर
भात चाहिए , यह मेरी सीधी सरल सी मांग है , ठंडा हो या गरम
महीन हो या खासा मोटा या राशन मे मिलने वाले लाल चावल का बना भात ,
कोई शिकायत नहीं होगी मुझे ,एक मिटटी का सकोरा भरा भात चाहिये मुझे .
दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिल जाये तो मैं अपनी समस्त मांगों से मुंह फ़ेर लूँगा .
अकारण मुझे किसी चीज़ का लालच नहीं है, यहाँ तक की यौन क्षुधा भी नहीं है मुझ में
में तो नहीं चाहता नाभि के नीचे साड़ी बाधने वाली साड़ी की मालिकिन को
उसे जो चाहते है ले जाएँ , जिसे मर्ज़ी उसे दे दो .
ये जान लो कि मुझे इन सब की कोई जरुरत नहीं
पर अगर पूरी न कर सको मेरी इत्ती सी मांग
तुम्हारे पूरे मुल्क मे बवाल मच जायेगा ,
भूखे के पास नहीं होता है कुछ भला बुरा , कायदे कानून
सामने जो कुछ मिलेगा खा जाऊँगा बिना किसी रोक टोक के
बचेगा कुछ भी नहीं , सब कुछ स्वाहा हो जायेगा निवालों के साथ
और मान लो गर पड़ जाओ तुम मेरे सामने
राक्षसी भूख के लिए परम स्वादिष्ट भोज्य बन जाओगे तुम .
सब कुछ निगल लेने वाली महज़ भात की भूख
खतरनाक नतीजो को साथ लेकर आने को न्योतती है
दृश्य से द्रष्टा तक की प्रवहमानता को चट कर जाती है .
और अंत मे सिलसिलेवार मैं खाऊंगा पेड़ पौधें , नदी नालें
गाँव देहात , फुटपाथ, गंदे नाली का बहाव
सड़क पर चलते राहगीरों , नितम्बिनी नारियों
झंडा ऊंचा किये खाद्य मंत्री और मंत्री की गाड़ी
आज मेरी भूक के सामने कुछ भी न खाने लायक नहीं
भात दे हरामी , वर्ना मैं चबा जाऊँगा समूचा मानचित्र.
Monday, November 6, 2017
इंसाफ कौन करेगा?
भोपाल रेप पीड़िता का मीडिया को दिया गया बयान -
"चार दिन हो गये, मैं माता-पिता के साथ भटक रही हूँ। कभी बयान के लिये थाने तो कभी जाँच के लिये अस्पताल। पहले दिन एफआईआर दर्ज कराने के लिये संघर्ष करती रही। दूसरे दिन पुलिस ने बयान के लिये दिन भर थाने में बैठाकर रखा। तीसरे दिन मेडीकल और चौथे दिन मुझे सोनोग्राफी के लिये बुलाया गया। वही सवाल और वही जगह मेरे सामने बार-बार आ रही हैं। 'क्या हुआ था ? कहाँ हुआ था ? कितने लोग थे ? कैसे दिखते थे ? क्या बोल रहे थे ?' सवाल इतने कि जबाब देते-देते गले से आवाज निकलना बंद हो जाती, लेकिन उनके सवाल खत्म नहीं होते।
सिस्टम और पुलिस के खिलाफ अफसोस नहीं बल्कि गुस्सा है। हादसे के दिन एसआरपी अनिता मालवीय महिला होते हुये भी मजे लेती रहीं। वह मेरी कहानी सुनकर हंसती हैं, तो न्याय की उम्मीद कहाँ रह जाती है। पोस्ट पर तो छोड़ो वे पुलिस की वर्दी पहनने लायक नहीं हैं। मेरी इस लड़ाई में मेरे माता-पिता हर दम मेरे साथ हैं। उन्होंने मुझे संभाला और आरोपियों के खिलाफ लड़ने की हिम्मत दी।
उन दरिंदों के साथ रहम नहीं होना चाहिये। मैं गिड़गिड़ा रही थी। वे हंस रही थे। उन सभी को बीच चौराहे पर फाँसी दे देनी चाहिये। मेरी एक ही अपील है कि इस तरह की वारदात के बाद परिजनों को पीड़िता का साथ देते हुये आवाज उठाना चाहिये।"
रेप पीड़िता के लिये समाज और सिस्टम की निर्दयता और लापरवाही के फिल्मों में दिखाये दृश्य हमें अतिश्योक्ति लग सकते हैं, लेकिन वो हकीकत हैं आज भी। न हम बदले हैं न सिस्टम। रेप आज भी हमारे लिये तमाशा और चटकारे लेकर सुनाई जाने वाली कहानी है। म.प्र. की राजधानी के ये हाल हैं, तो बाकी जगह न जाने क्या होता होगा। महिलायें अपनी सुरक्षा खुद करें, हम नहीं सुधरेंगे।
Sunday, November 5, 2017
खुद को पहचानो
🎡 जय श्री कृष्णा 🎡
एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था |
एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ |
उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा :-
स्वामी, एक प्रश्न बीस वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं | कोई उत्तर नहीं मिलता | क्या आप मुझे उत्तर देंगे ?
स्वामी ने कहा :- निश्चित दूंगा |
उस संन्यासी ने उस राजा से कहा :- नहीं, आज तुम खाली नहीं लौटोगे | पूछो |
उस राजा ने कहा :- मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं | ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करना | मैं सीधा मिलना चाहता हूं |
उस संन्यासी ने कहा :- अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर ?
राजा ने कहा : - माफ़ करिए, शायद आप समझे नहीं | मैं परम परमात्मा की बात कर रहा हूं, आप यह तो नहीं समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले आदमी की बात कर रहा हूं। जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो ?
उस संन्यासी ने कहा :- महानुभाव, भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है | मैं तो चौबीस घंटे परमात्मा से मिलाने का धंधा ही करता हूं | अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं, सीधा जवाब दें |
बीस साल से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया तो मिल लो |
राजा ने हिम्मत की, उसने कहा :- अच्छा मैं अभी मिलना चाहता हूं मिला दीजिए |
संन्यासी ने कहा : -कृपा करो, इस छोटे से कागज पर अपना नाम पता लिख दो ताकि मैं भगवान के पास पहुंचा दूं कि आप कौन हैं |
राजा ने लिखा - अपना नाम, अपना महल, अपना परिचय, अपनी उपाधियां और उसे दीं |
वह संन्यासी बोला कि महाशय, ये सब बाते मुझे झूठ और असत्य मालूम होती हैं जो आपने कागज पर लिखीं |
उस संन्यासी ने कहा :- मित्र, अगर तुम्हारा नाम बदल दें तो क्या तुम बदल जाओगे ?
तुम्हारी चेतना, तुम्हारी सत्ता, तुम्हारा व्यक्तित्व दूसरा हो जाएगा ?
उस राजा ने कहा :- नहीं, नाम के बदलने से मैं क्यों बदलूंगा ? नाम नाम है, मैं मैं हूं |
तो संन्यासी ने कहा : -एक बात तय हो गई कि नाम तुम्हारा परिचय नहीं है, क्योंकि तुम उसके बदलने से बदलते नहीं | आज तुम राजा हो, कल गांव के भिखारी हो जाओ तो बदल जाओगे ?
उस राजा ने कहा : -नहीं, राज्य चला जाएगा, भिखारी हो जाऊंगा, लेकिन मैं क्यों बदल जाऊंगा ?
मैं तो जो हूं हूं | राजा होकर जो हूं, भिखारी होकर भी वही होऊंगा |
न होगा मकान, न होगा राज्य, न होगी धन- संपति, लेकिन मैं ? मैं तो वही रहूंगा जो मैं हूं |
तो संन्यासी ने कहा :- तय हो गई दूसरी बात कि राज्य तुम्हारा परिचय नहीं है, क्योंकि राज्य छिन जाए तो भी तुम बदलते नहीं |
संन्यासी ने कहा :: तुम्हारी उम्र कितनी है ?
उसने कहा : - चालीस वर्ष |
संन्यासी ने कहा : -तो पचास वर्ष के होकर तुम दुसरे हो जाओगे ? बीस वर्ष या जब बच्चे थे तब दुसरे थे ?
उस राजा ने कहा :- नही | उम्र बदलती है, शरीर बदलता है लेकिन मैं ? मैं तो जो बचपन में था, जो मेरे भीतर था, वह आज भी है |
उस संन्यासी ने कहा :- फिर उम्र भी तुम्हारा परिचय न रहा, शरीर भी तुम्हारा परिचय न रहा |
फिर तुम कौन हो ? उसे लिख दो तो पहुंचा दूं भगवान के पास, नहीं तो मैं भी झूठा बनूंगा तुम्हारे साथ |
यह कोई भी परिचय तुम्हारा नहीं है|
राजा बोला :- तब तो बड़ी कठिनाई हो गई | उसे तो मैं भी नहीं जानता फिर ! जो मैं हूं, उसे तो मैं नहीं जानता ! इन्हीं को मैं जानता हूं मेरा होना I
उस संन्यासी ने कहा :- फिर बड़ी कठिनाई हो गई, क्योंकि जिसका मैं परिचय भी न दे सकूं, बता भी न सकूं कि कौन मिलना चाहता है, तो भगवान भी क्या कहेंगे कि किसको मिलना चाहता है ?
तो जाओ पहले इसको खोज लो कि तुम कौन हो |
और मैं तुमसे कहे देता हूं कि जिस दिन तुम यह जान लोगे कि तुम कौन हो, उस दिन तुम आओगे नहीं भगवान को खोजने |
क्योंकि खुद को जानने में वह भी जान लिया जाता है जो परमात्मा है I
Friday, November 3, 2017
राधा
लगभग दस साल का बालक राधा का गेट बजा रहा था।
राधा ने बाहर आकर पूंछा।
"क्या है ? "
"आंटी जी क्या मैं आपका गार्डन साफ कर दूं ?"
"नहीं, हमें नहीं करवाना।"
हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में "प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा।"
द्रवित होते हुए "अच्छा ठीक है, कितने पैसे लेगा ?"
"पैसे नहीं आंटी जी, खाना दे देना।"
" ओह !! अच्छे से काम करना।"
"लगता है, बेचारा भूखा है। पहले खाना दे देती हूँ। राधा बुदबुदायी।"
"अरे लड़के ! पहले खाना खा ले, फिर काम करना।
"नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ। फिर आप खाना दे देना।"
"ठीक है ! कहकर राधा अपने काम में लग गयी।"
एक घंटे बाद "आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं।"
"अरे वाह! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए। यहाॅं बैठ, मैं खाना लाती हूँ।"
जैसे ही राधा ने उसे खाना दिया वह जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा।"
"भूखे पेट काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले। जरूरत होगी तो और दे दूंगी।"
"नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है। सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है, पर डाॅ साहब ने कहा है दवा खाली पेट नहीं खाना है।" तो माँ के लिए खाना ले जाऊंगा ताकि वो दवा ले सके।
Thursday, November 2, 2017
यौन_कुंठित_समाज
1. अकेली रहती है! मतलब साथ(सेक्स) कि जरूरत तो होगी ही, ट्राय तो मार मौज़ करने के लिए बेस्ट ऑप्शन है।
2. बाहर रहकर पढ़ी है मतलब घाट-घाट का पानी हुई है। पक्का कैरेक्टरलेस है। हाथ रखते ही तैयार हो जाएगी। ऐसियों का क्या....
3. दिल्ली में रहती है मतलब खुली होगी। मेट्रो सिटीज़ में रहने वाली लड़कियां तो बहुत खुली {रंडी} होती हैं, पता नहीं कितनों के साथ सो जाए। यहाँ खुली का मतलब सेक्स के लिए हमेशा आसानी से उपलब्ध रहने से है।
3. गाँव की है, सीधी होगी। मतलब इसको आसानी से बेवकूफ़ बनाकर यूज़ कर सकते हैं। छोटे शहर की है! मतलब चालू होगी।
4. ब्रेकअप हो गया है! मतलब रोती लड़की को विश्वास देकर सेक्स की जुगाड़ की जा सकती है।
5. पहले बॉयफ्रेंड ने चीट किया है! ओह्ह बेबी मैं ऐसा नहीं हूं, दुनिया से अलग हूँ। यार चीट हुई लड़कियों को यूज़ करना औऱ आसान है। सिली गर्ल्स......
6. नीच जात की है! यार ये चमारिनें होती बहुत बेवकूफ़ हैं। मैं जाति को नहीं मानता, शादी करूँगा बस इतने में तो तन-मन-धन से समर्पित हो जायेंगी।
7. काली है! ओह्ह....यार रंग से कुछ नहीं होता काला रंग तो बहुत खूबसूरत होता है। यार उस कलूटी को ऐसे नहीं बोलूंगा तो बिस्तर तक कैसे आएगी।
8. सेल्फ डिपेंड है! इमोशनल फुल बनाकर सारी अय्याशी करने का बढ़िया ऑप्शन है। इंडिपेंडस और बराबरी की बात कर देख कैसे नीचे करती है।
9. तलाकशुदा है ! विधवा है! यार कंधा ही तो देना है बस वो पैर खोलने की लिए तैयार मिलेंगी।
10.अभी स्कूल में पढ़ रही है! लगती तो एकदम माल है, गोटी सेट करनी पड़ेगी।
बातें चाहे जितने तरीके से हों..... केंद्र में बस " सेक्स" है। ऐसे ही नहीं हर दिन रेप हो रहे, ये रेप की तैयारी तो हरपल हो रही है। नाभि के ठीक तीन इंच नीचे केंद्रित रहने वाला भारतीय समाज.....
#यौन_कुंठित_समाज
पढ़िए Deepali tayday की बेहतरीन पोस्ट .... मैं उनको टैग नही कर पा रही
Tuesday, September 26, 2017
लोकतंत्र
जोज़फ इस्टालिन एक बार अपने साथ संसद में एक मुर्गा लेकर आये,
और सबके सामने उसका एक-एक पंख नोचने लगे,
मुर्गा दर्द से बिलबिलाता रहा मगर,
एक-एक करके इस्टालिन ने सारे पंख नोच दिये,
फिर मुर्गे को फर्श पर फेंक दिया,
फिर जेब से कुछ दाने निकालकर मुर्गे की तरफ फेंक दिए और चलने लगा,
तो मुर्गा दाना खाता हुआ इस्टालिन के पीछे चलने लगा,
इस्टालिन बराबर दाना फेंकता गया और मुर्गा बराबर दाना मु्ँह में ड़ालता हुआ उसके पीछे चलता रहा।
आखिरकार वो मुर्गा इस्टालिन के पैरों में आ खड़ा हुआ।
इस्टालिन स्पीकर की तरफ देखा और एक तारीख़ी जुमला बोला,
"लोकतांत्रिक देशों की जनता इस मुर्गे की तरह होती है,
उनके हुकमरान जनता का पहले सब कुछ लूट कर उन्हें अपाहिज कर देते हैं,
और बाद में उन्हें थोड़ी सी खुराक देकर उनका मसीहा बन जाते हैं"।
*This is our position at present...*.
2019 के लिए तैयार रहें। बहुत जल्द जनता को दाने फेके जाएंगे।
Monday, September 25, 2017
हंस और हंसनी
👍🍃🍂🌿🌾🌾🌾🌾🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!
हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ??
यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा !
भटकते भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !
रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था।
वह जोर से चिल्लाने लगा।
हंसिनी ने हंस से कहा- अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते।
ये उल्लू चिल्ला रहा है।
हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ??
ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।
पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।
सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ करदो।
हंस ने कहा- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद!
यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा
पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।
हंस चौंका- उसने कहा, आपकी पत्नी ??
अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!
उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।
दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये।
कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी।
पंचलोग भी आ गये!
बोले- भाई किस बात का विवाद है ??
लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है!
लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे।
हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है।
इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए!
फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!
यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया।
उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!
रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको!
हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ??
पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?
उल्लू ने कहा- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी!
लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है!
मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है।
यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!
शायद 65 साल की आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने उम्मीदवार की योग्यता न देखते हुए, हमेशा ये हमारी जाति का है. ये हमारी पार्टी का है के आधार पर अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है, देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैँ!
"कहानी" अच्छी लगे तो आगे भी बढ़ा दें...