#नचनियाँ
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" डोंट टच मी ..सिक्योरिटी व्हेर आर यू ? "
उसके बाद जो हुआ उसने मेरी पसलियाँ ही खोल दी ..वो गन्दा -मटमैला ..बदबूदार बूढ़ा वहीं गला चाक़ू से रेत गया ....
लहू का एक फुव्वारा उसकी गर्दन से छूटा और उसके बाद उसने जमीन पर एड़िया घिसनी शुरू कर दी ...कुछ 10 मिनट तक उसके जिस्म में हरकत दौड़ती रही ...और फिर सब खामोश .....उसका शव तो एम्बुलैंस ले गई लेकिन छोड़ गई कई सवाल भी ।
आज की बेहद डिमांडबल फ़िल्मी अभिनेत्री " दामनी " जी का बॉडी गार्ड हूँ मैं ...उनको टच करने वाला मेरा जानी दुश्मन होता है ..बहुत प्यार करता हूँ मैं उनसे ...तब से जब से उनका कमर हिलाने का फर्स्ट वीडियो मेरे मोबाईल में डाउनलोड हुआ ...
बड़ा श्रम ..बड़े सोर्स और मोटा पैसा लगाया मैंने कि मैं उन के करीब पहुँच सकूँ ..ताकि एक दिन उन्हें जता -बता सकूँ कि वो मेरी जिंदगी हैं ।
मैंने कई मनचलों के हाथों की अंगुलियाँ चटकाई हैं जिन्होंने भी उनको छूने की जुर्रत की ...मुझे आज भी याद है वो वाक्या जब खचाखच भीड़ में किसी नशेड़ी ने उनके सीने पर हाथ मारा था ... कुल 3 किमी. दौड़ा था उसके पीछे और उसका वो हाथ ही कंधे से चटका दिया था मैंने .....
लेकिन पता नही इस बूढ़े पर मुझे क्रोध क्यूँ नही आया ...खैर दामिनी जी से मेरा इश्क इसलिए भी गहराता गया की उन्होंने कड़े संघर्ष के बाद अपनी राह बनाकर अपनी मंजिल पाई है .....
और लोग कहते हैं कि एक छमिया मर्दों के सामने नाच कर ..उनसे सम्बन्ध दर , सम्बन्ध बनाकर यहाँ तक पहुँची है ...
लेकिन मैं सुधाकर प्रश्न करता हूँ कि ..कहाँ थे फिर वो मर्द जो आज उनपर तोहमत लगाते है ...क्यूँ नही रोका उन्होंने ये निजाम ...जिस देश में हर कन्या में दुर्गा बसती है उसी देश के मर्द एक कन्या को खटिया-टोटे में बैठकर नचाते हैं ...कहाँ थे वो नारीवादी थोथे विचारक जब भरी महफ़िलों में दामिनी जी के अंगों को लोग निहारते थे और लार टपकाते थे ..कहाँ थी वो फेमिनिस्ट जो किसी बच्ची या युवती के साथ रेप होने के बाद मोमबत्तियां लिए सड़कों पर मिलती है ..कि क्यूँ नही आवाज बुलन्द की उन्होंने तब , जब नाचती हुई दामनी जी पर लोग झुण्ड बनाकर टूट पड़ते थे ...असल में एक अबला की मजबूरी का सबने फायदा उठाया ..वो अबला ,असहाय जिसका मेरे सिवा कोई हितैषी नही ...वो अनाथ लड़की जिसने अपना कद और नाम बनाने के लिए अपना जिस्म और उसकी थिरकन भी लोगों के सामने दाँव पर लगाई है ...
" आई लव यू दामिनी जी ..मैं आपके बिना नही रही रह सकता "
रात भर शराब के नशे में अक्सर यही बड़बड़ाता हूँ और फिर ऐसे ही आँख लग जाती है ।
लेकिन सुबह जब सेव कर रहा था तब न जाने क्योंकर लापरवाही से गाल में कट लग गया और खून निकल आया ...जैसे ही मैंने उस खून की बूँद को अँगुली के पोरे से छुआ मुझे कल की घटना याद आ गई ...और न जाने क्यूँ एकदम से उबकाई आ गई ...इतनी तेज मितली कि पेट का सब वाशबेसिन पर उड़ेल दिया ....
कुछ देर बाद राहत मिली और दामिनी जी के पी.ए का फोन आया कि आज मैडम रेस्ट करेंगी ..नो शूटिंग ..नो प्रोग्राम ...
आज छुट्टी थी लेकिन गाल का कट अब भी चुभ रहा था ...न जाने क्यूँ मैंने वैसी ही हालत में स्पोर्ट्स शूज पैर में डाले और घर को लॉक कर निकल गया ...
" हैलो सर ..वो कल ..वो जो आदमी ने खुद का गला काटा कौन था ...कुछ पता चला ...जी मैं दामिनी जी का बोडीगार्ड सुधाकर सिन्हा !"
" जी ...कोई आत्माराम हैं..कुर्ते की जेब में आधार कार्ड मिला है इनके ...बाकि टीम भेजने वाले हैं इनके गाँव सुरई गाँव में ...बाई दी वे आप अपना नम्बर दे दें ..जैसे ही कुछ पता चलता है हम आपको बताते हैं "
फ़्लैट में लौटा ..और बाथ लिया ...जिम जाने की जगह मैंने कार का बोनट सुरई गाँव की ओर टांका और एक्सीलरेटर दाबा ....
जहन में कोई सवाल नही था ...क्यूँ सुरई गाँव जा रहा हूँ ..पता नही था ..बस एक ख़ामोशी थी ...जिसे मैंने दामनी जी पर फिल्माए एक एक गाने से कुछ हद तक कम किया ...लेकिन जियादह देर तलक फिर उसे भी न सुन पाया ...
" ए भैया ..ये सुरई गाँव के लिए कौनसी सड़क जायेगी ...?"
" ई आगे जाकर ..पहिला कच्चा मिट्टी का रास्ता लगता है बाबूजी ..."
रास्ता यकीनन मिट्टी का था ...इतनी मिट्टी ..इतनी धूल की मुझे कार के शीशे बन्द करने पड़े ..लेकिन तभी कार का पिछला टायर एक गड्ढे में जा फंसा ...और बड़ी मशक्कत के बाद भी वो नही निकला ...मदद के लिए दूर तलक कोई नही था ..मैंने कार वहीँ लॉक की और खुद से कई बार सवाल किया कि आगे बढ़ा जाये या पीछे लौटा जाये ....
खैर सिक्का उछाला और बन्द मुट्ठी में उसे देख कर कुछ देर खामोश रहने के बाद सुरई गाँव तक पैदल पहुँचने पर अपना पहला कदम आगे फेंका ...
जितना आगे बढ़ता गया ...उतना दिमाग उकताता गया ,,,, हर तरफ वीरान -बंजर खेत ...दूर -दूर तलक कोई आबादी नही लेकिन कुछ घास -फूस के कच्चे मकान भी नजर आये ..... एक जगह तेज बदबू से उबकाई आते-आते रही ...गिद्धों का झुण्ड एक मरे बैल को नोच रहा था ....पानी बोटल में खत्म होने की कगार पर ...और गर्मी इस कदर जैसे मैं सूरज की जमीन पर उतर गया हूँ ....
खेत तो खेत . ..शजर (पेड़ ) भी सूखे ...और घास भी ...हर तरफ एक मातम करता नजारा ...
तभी मुझे पास एक घर दिखा ....मैंने वहाँ पहुँचकर जब आवाज लगाई ..तो एक जिन्दा लाश ने दरवाजा खोला ..महज पसलियों को पहना वो आदमी सिर्फ गुप्तांग ढँका हुआ था ....उसके दो बच्चे मिट्टी से लीपी जमीन पर लेटे थे...और उसकी लुगाई खड़ी घास के कण्डे बुन रही थी ...
" भैया जी ये सुरई गाँव कितना दूर है .?"
" बाबू ई कुछ एक मील अउर ..."
" पानी मिलेगा ....प्यास बहुत लगी है ..."
" बाबू ..4 मील दूर से पानी लाते हैं ...और वो भी एक तालाब का ..थोड़ा मटमैला है ...पी सकेंगे का ..?
पानी की शक्ल देखकर पता लगा कि ये लोग रोज पानी के नाम पर जहर पी रहें है ...मरता क्या न करता ...अपने रुमाल से छान कर उस पानी को अपनी बॉटल में भरा और आगे बढ़ा ...
सुरई गाँव मेरे सामने खड़ा था ...दौड़ती मेट्रो ..एयरवेज ..बसेज ..और चाँद -सितारों पर पहुँचने वाला देश ..वो देश जहाँ छोटी से छोटी मीटिंग्स में बोतल बन्द पानी से कुल्ला किया जाता है ...ऐसा देश जो नदियाँ का स्वर्ग है ..वहाँ एक बूँद साफ़ पानी भी इन इंसानों को मयस्सर नही ....
लगभग घर सूने ...उदास ..बंजर ...जहाँ लोगों के जिस्म इस कदर कुपोषित की मौत किसी भी घर बस घात लगाये बैठी है ...जहाँ कपड़ों के नाम पर महज चीथड़े ...और देश में जहाँ नेता-अभिनेता हर दूसरे पहर एक बार उतारा कपड़ा दुबारा जिस्म में नही चढ़ने देते ...
" ए भाई ये आत्माराम का घर कहाँ हैं ..?"
" ई तो रहा ..उ नाही है इहाँ . "
आत्माराम का घर ..घर नही एक पिंजरा था ..जिसमें एक टूटी उदास बुढ़िया घास की मोजोल बोरे में भर के उसके ऊपर लेटी थी ....घर में उसके सिवा सिर्फ मिट्टी के कुछ बर्तन थे और धातु कहने में एक स्टील का छोटा कुकर ....
" आ गवे का ..लच्छी के बापू ...?"
आँख से बैठ गई थी वो औरत ..मैंने उससे बात न करके एक आदमी को पकड़ा ...उसे 100 का एक नोट दिया और उसने बताया ...
कि कभी ये गाँव हँसता-खेलता और फलता -फूलता था ..लेकिन कुछ साल पहले के अकाल ने इस गाँव की रौनक और आबादी को निगल लिया ...तालाब सूख गये ..कुल मिलाकर 12 -15 जन है यहाँ इसलिए अब नेता भी यहाँ नही आते ...वरना पहले अक्सर चुनाव में यहाँ पैसा भी बँटता था और उम्मीदें भी ....
ये गाँव किसानों की आत्महत्या का गढ़ है ..यहाँ हर कदम पर किसानों ने अपनी जानें दी है ..और उसके बाद हर दूसरा कदम उनके परिवार की जानों का गवाह है ....
आत्माराम की तीन बेटियाँ थी ... और तीन खेत भी ...एक बचपन में सामूहिक बलात्कार का शिकार होकर जान गंवा बैठी ...दूजी ने उँची जात पर प्रेम करने की सजा पाई ..तीसरी लच्छी जिसका कोई अता -पता नही
मैंने जोर देकर पूछा मतलब क्या हुआ था ....उसके साथ
" नाचती थी पहिले गाँव की ब्याह -बारात में ...फिर सरपंच ने अपने घर रख लिया ...फिर अपने साथ शहर ले गए ...पता चला था कि वो भी बीमारी के चलते नही रही फिर पता नही जो हुआ राम जाने "
खटका तो हुआ ...और मैंने सीधे आत्माराम की झोपड़ी में प्रवेश किया ...और इधर-उधर झाँका -ताँका ..एक लकड़ी का सन्दूक मिला ...उसको खोला बुढ़िया चिल्लाती रही ....और हाथ लगी एक पुरानी फोटो ...जिसमें आत्माराम एक मेले में अपने परिवार संग खड़े हैं ....लेकिन उस परिवार में एक की शक्ल बता रही थी कि वो दामनी है ...यानि लच्छी .....
" कौन है ये लच्छी ..?."
बुढ़िया ने बाताया उसकी सबसे छोटी बेटी जो बड़े शहर में एक बड़ी नचनिया बन गई है ..पैसे भी खूब बनाती है ..सनीमा में आती है ...उसके बापू को जब पता चला तो उसके पास गए ..उसने दूई बार पहचानने से मना किया और एक बार धक्का और धमकी देकर घर से निकलवा दिया ...लेकिन वो शायद पहचानी नही होगी ...इसलिए इस बार फिर मिलने गए हैं ...जो था सब बिक चुका है शहर आने-जाने में ...जानते हैं कि उसका सनीमा देखने वालो को पता लगेगा तो इसकी इज्जत खराब होगी लेकिन कुछ मदद कर दे पैसे टके से तो और जी ले...खाने को अनाज का एक तिनका नही ..और पीने को एक चुल्लू पानी नही ....
सब समझ गया ...सब कुछ ...आक थू .. दिल गवाही दे रहा था कि ..नचनिया अपनी मजबूरी से नही बल्कि अपने शौक से बनी लच्छी ... मर्दों के सामने अपनी इज्जत उसने खुद नीलाम करवाई ..और वो भी वहाँ तक पहुँचने के लिए जहाँ भारत के घर की मासूम बच्चियों की वो डांस आइडियल बन सके ...वो बच्चियां जिनके कदम स्कूल ..कॉलेजेज और अपनी बेहतरी की जानिब उठे ...मर्दों के सामने नाचने के लिये नही ... ये आज के भारत के बच्चे और युवा जो ये समझ बैठे हैं कि असली फेम और नाम यूँ अपने जिस्मों को बेहयाई से किसी फूहड़ गीत में झूमाने से वो स्टार बन सकतें हैं तो वो सच ही सोचते हैं क्यूँकि हम माता -पिता उन्हें खुद उन नजरों और इरादों को सौंप रहे हैं जिनका धंधा भारत की युवा शक्ति को पद भ्रष्ट करने पर टिका है .. नृत्य पाप नही बल्कि ये एक कैफियत है ...नटराज से लेकर सूफियत भी इसपर आश्रित है लेकिन एक सवाल उन युवाओं ..नेताओं और अभिनेताओं से.. कि संस्कृति ने हमें सीखाया कि वृद्ध माँ -बाप की सेवा व्यक्ति का धर्म ही नही अपितु कर्तव्य भी है ...मजहब कहता है कि इनकी खिदमत करने वाले से ख़ुदा राजी तो फिर अगर ये युवा सिर्फ इसलिए सशंकित है कि माता-पिता की गरीबी ..दीनता और पुरानापन उनकी मॉडर्निटी के बीच का रोड़ा है तो फिर आइये हम एक नई इबारत मिलकर लिखें कि किसान ,,युवाशक्ति ..मजदूर और शोषित का नही बल्कि ये मुल्क अब नचईयों और समाज को विकृत करते परजीवियों की महत्वकांक्षाओं का एक मंच मात्र बन गया है ।।।।।
दामिनी दिल से उतर चुकी थी ...और उसकी माँ अब मेरे साथ कार में थी ...मुझे नही पता कि अब जिंदगी दामिनी के बगैर क्या होगी लेकिन मुमकिन है ...कि जिंदगी एक माँ के साथ जन्नत है बजाय एक बाजारू नचनिया और बेगैरत औलाद के साथ से ।।।
सिक्का जिसने हथेली पर गिरते ही रोका था सुरईगाँव जाने से.. उसे फिर वहीँ चलती कार से फेंक आया .....
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
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