Tuesday, October 22, 2019

बूढ़ी दादी

बूढ़ी दादी

बनारस में एक चर्चित दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब दोस्त-यार आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की बुजुर्ग स्त्री पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई।

उनकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी। नेत्र भीतर को धंसे हुए किन्तु सजल थे। उनको देखकर मन मे न जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया,

"दादी लस्सी पियोगी ?"

मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक। क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 25 रुपए की एक है। इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी दादी के द्वारा मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी।

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए। मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा,

"ये किस लिए?"

"इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी !"

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था... रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी।

एकाएक मेरी आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा... उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गई।

अब मुझे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका।

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे.....कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये... लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी.....

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम सब मित्रों और बूढ़ी दादी के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पास ही जमीन पर बैठ गया क्योंकि ऐसा करने के लिए तो मैं स्वतंत्र था...इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती थी... हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा... लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा,

"ऊपर बैठ जाइए साहब! मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं किन्तु इंसान कभी-कभार ही आता है।"

अब सबके हाथों मे लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर सहज मुस्कुराहट थी, बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसू, होंठों पर मलाई के कुछ अंश और दिल में सैकड़ों दुआएं थीं।

न जानें क्यों जब कभी हमें 10-20 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उसपर खर्च करने होते हैं तो वो हमें बहुत ज्यादा लगते हैं लेकिन सोचिए कि क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं?

क्या कभी भी उन रुपयों को बीयर , सिगरेट ,पर खर्च कर ऐसी दुआएं खरीदी जा सकती हैं?

जब कभी अवसर मिले ऐसे दयापूर्ण और करुणामय काम करते रहें भले ही कोई अभी आपका साथ दे या ना दे, समर्थन करे ना करें। सच मानिए इससे आपको जो आत्मिक सुख मिलेगा वह अमूल्य है।

Tuesday, October 8, 2019

रावण

रावण से अचानक ही भेंट हो गयी मेरी ! ये घास फूस और पटाखे भरा रावण नही था ! सच्ची मुच्ची का रावण था ! कम हाईट का , बैचैन सा ,दशहरा मैदान की मेले की भीड मे भटकता रावण ! वैसे तो उसे बतौर रावण पहचान पाना नामुमकिन ही था ! रावण को जलते देखने आई भीड मे अक़ेला छूट गया बच्चा ही लगा मुझे वो ! मुझे लगा अपने गार्जियन की ऊँगली छूट जाने से इस खो गये बच्चे की मदद करना ही चाहिये !
जाहिर है मैने उससे उसका नाम पता जानना चाहा ! जवाब मिला रावण ! रावण ! आज के ज़माने मे अपने बच्चे का नाम रावण कौन रखता है ! ग़ौर से देखने पर मैने पाया कि वो लगने के बावजूद बच्चा है नही ! अच्छा खासा अधेड़ बंदा है ! पूछताछ करने पर और बतौर आईडियेन्टिटी उसकी जली नाभि देखने के बाद ही तस्दीक़ हो सकी कि ये बालक सा दिखता आदमी लंका का राजा रह चुका रावण ही है !
पर आप तो किसी कोण से रावण नही दिखते ! हमारी धार्मिक किताबे तो बताती है रावण हट्टा कट्टा गामा पहलवान टाईप बंदा था !
वैसा ही था मै !
था मतलब !
आप के जमाने मे मुझसे बेहतर रावण के इतने एडीशन आ चुके कि मारे शर्मिंदगी के ऐसा छोटा हो चला हूँ मै !
पर हम तो हर साल इस घास फूस वाले रावण को चार छह फ़ुट और ऊँचा कर देते है !
वो मै नही ! वो तुम खुद हो ! तुम्हारा मन खुद मंजूर करता है कि अनाचार और बुराइयाँ पिछले साल से ज्यादा बढी है ,नतीजन इस पुतले की हाईट अपने आप बढ जाती है !
पर आपके बारे मे तो खबर यही है कि दस सर थे आपके !
दस सर जैसी कोई बात कभी नही थी ! लोगो का मानना था कि दस आदमियो जितनी बुद्धि थी मेरे पास ,इसलिये लिखने वालो ने यह बात बना ली !
पर आप इतने परेशान से क्यो हैं !
मै अपनी पहचान छोटी होते देखकर परेशान हूँ ! हिंदुस्तान मे लाखो लाख ऐसे फिर रहे है जो दस से ज्यादा चेहरे लगाये हुये है ! वो वक्त जरूरत जंचने वाला चेहरा लेकर सोसायटी से मुखातिब होते है ! उनके कारनामे मुझे मात करने वाले है !
अब ऐसा क्या कर दिया हम लोगो ने !
अब हँसा रावण ! हाँलाकि उसकी हँसी वैसी कतई नही थी जैसा वो फ़िल्मों और टीवी स्क्रीन पर हँसते देखा जाता है ! आँसुओं से भीगी हँसी थी ये ,और इस हँसी के बावजूद वो रावण ही था !
क्या नही किया आप लोगो ने ! क्या नही कर रहे आप लोग ! लडकियो को पैदा होने के पहले मारने वाले लोग है आप लोग ! क्या आपकी राजधानी मे कोई लडकी शाम को सड़कों पर बिना डरे अकेली आ जा सकती है ! आपके शहरों मे कुछ मकान सोने के और कुछ फूस के है पर आप इसे लेकर शर्मिंदा नही है ! अनगिनत भूखे लोगो के बीच कुछ लोग ज्यादा खाने की वजह से मर रहे है पर आपको यह बात अजीब नही लगती ! आप खुद डरे हुये है और सब को डरा कर रखना चाहते है ! जमीन ,जंगल ,नदियाँ ,पहाड़ सब कुछ खा जाने की आपकी भूख मुझे लज्जित करती है ! आपके जमाने मे साँस लेने तक के लिये साफ हवा हासिल नही ! आप वो लोग है जो किसी भी दूसरे आदमी को उसके विचारों ,उसके धर्म ,उसके कपड़ों या उसके खाने की थाली को देख कर ही उसे मार देने का फैसला कर सकते हैं ! और ऐसा करने के बाद भी आपकी आत्मा आपको धिक्कारती नही ! मेरे वक्त ऐसा नही था ! ना ऐसी सोच रखने वाले ही आसपास थे मेरे ! मेरे राज्य मे सभी निर्भय और सुखी थे ! मैने कभी सिद्धान्तों से समझौता नही किया ! मै पीठ पीछे वार करने वालो मे से नही था ! मै वो था जो अपने शत्रु को भी सच्चे मन से विजयी होने का आशीर्वाद दे सकता था ! सही बात तो ये है कि आप नफरत की खाद पर पलते खतपतवार से है ! लालची ,कायर ,बडी बडी बाते करने वाले छोटे लोग है आप लोग ,जो मेरे पुतले को जलाने का तमाशा भर कर सकते है !
और फिर ,मुझे मारने खुद राम आये ! उनके आने से सम्मानित हुआ मै ! पर आप लोगो ने बुराई को भी उस निकृष्ट स्तर पर ला दिया है कि राम भी शायद दूर ही रहना चाहे आप लोगो से !
रावण सच मे नाराज था ! मै हक्का बक्का था ! शर्मिंदा होने की बारी अब मेरी थी ! भीड मे एक बार फिर खो गये रावण की ऐसी खरी खरी सुनने के बाद मै एक ही काम कर सकता था ,और वही किया मैने ! मै रावण दहन के पहले ही घर लौट आया !

Tuesday, September 10, 2019

कढा़ही पनीर | Kadai Paneer Recipe | Spicy Kadhai Paneer Curry with Thick Gravy

कढा़ही पनीर |
Kadai Paneer Recipe | Spicy Kadhai Paneer Curry with Thick Gravy

पनीर से तरह-तरह की करी और डिश तैयार की जाती हैं, लेकिन जो स्वाद कढ़ाही पनीर में आता है, उसका मुकाबला अन्य किसी भी पनीर की डिश से नही किया जा सकता. आइए देखते हैं इसकी बेहद सरल रेसिपी.

आवश्यक सामग्री - Ingredients for Kadai Paneer Recipe
पनीर - 300 ग्राम
शिमला मिर्च - 1 (150 ग्राम)
टमाटर - 3 (250 ग्राम)
हरी मिर्च - 2
काजू - 10-12
तेल - 2-3 टेबल स्पून
हरा धनियां - 2-3 टेबल स्पून (बारीक कटा हुआ)
हींग - 1 पिंच
जीरा - 1/2 छोटी चम्मच
हल्दी - 1/3 छोटी चम्मच
धनियां पाउडर - 1 छोटी चम्मच
कसूरी मेथी - 1 टेबल स्पून
अदरक पेस्ट - 1 छोटी चम्मच
गरम मसाला - एक चौथाई छोटी चम्मच से कम
लाल मिर्च - 1/4 छोटी चम्मच
नमक - 1 छोटी चम्मच या स्वादानुसार

विधि - How to make Spicy Kadhai Paneer Curry with Thick Gravy
पनीर को 1 इंच के चौकोर टुकड़ों में काट लीजिये. शिमला मिर्च भी अच्छे से धो लीजिये. इसके बीज हटाकर इसे चौकोर टुकड़ों में काट लीजिये.
पैन में 2-3 छोटी चम्मच तेल डाल कर गरम कीजिये, गरम तेल में पनीर के टुकड़े सिकने के लिए लगा दीजिए और नीचे की ओर से हल्के से ब्राउन होने तक सेक लीजिये. पनीर के टुकड़े नीचे से हल्के ब्राउन हो जाने पर इन्हें पलट लीजिए और दूसरी ओर से भी हल्का ब्राउन होने तक सिकने दीजिए. दोनों ओर से सिक जाने पर पनीर के टुकड़ों को प्लेट में निकाल लीजिए.
शिमला मिर्च के टुकड़ों को भी पैन में डालकर हल्का सा क्रन्ची होने तक भून लीजिए. शिमला मिर्च को ढककर के 1 मिनिट के लिए पकने दीजिए. भुनी शिमला मिर्च को प्लेट में निकाल लीजिए.
टमाटर, हरी मिर्च और काजू का बारीक पेस्ट बना कर तैयार कर लीजिए.
पैन में 2 टेबल स्पून तेल डालकर गरम कीजिए. तेल गरम होने पर इसमें जीरा डाल कर भूनिये. जीरा भूनने के बाद इसमें हींग, हल्दी पाउडर, धनियां पाउडर और कसूरी मेथी डालकर मसाले को हल्का सा भून लीजिए. इसके बाद इसमें अदरक का पेस्ट, टमाटर, हरी मिर्च और काजू का पेस्ट और लाल मिर्च पाउडर डालकर मसाले को तब तक भूनिये जब तक मसाले के ऊपर तेल न तैरने लगे.
मसाला भुन जाने के बाद मसाले में नमक, गरम मसाला डालकर मिक्स कीजिए और 1/2 कप पानी डाल दीजिए. इसमें पनीर के टुकड़े, शिमला मिर्च और थोडा़ सा हरा धनिया डालकर अच्छे से मिक्स कर दीजिए.
सब्जी को ढककर 4-5 मिनिट धीमी आंच पर पकने दीजिए ताकि पनीर और शिमला मिर्च में सारे मसाले अच्छे से जज़्ब हो जाएं.
सब्जी को चैक कीजिए. कढ़ाही पनीर बनकर तैयार है. सब्जी को प्याले में निकाल लीजिए.
कढाही पनीर को हरा धनियां डाल कर सजाइये. स्वाद में लाज़वाब कढ़ाही पनीर को गरमागरम चपाती, परांठा, नॉन या चावल किसी के भी साथ परोसिये और खाइये.
3-4 सदस्यों के लिए

सुझाव
काजू के बदले खसखस, खरबूजे के बीच, क्रीम भी डाल सकते हैं.
अगर कढाही पनीर आपको प्याज लहसुन के साथ बनाना है, तब एक प्याज और लहसुन बारीक कतर लीजिये. कढ़ाही में घी या तेल डालकर गरम कीजिये, जीरा भूनिये, और कटे हुये प्याज और लहसुन को डालकर हल्का गुलाबी होने तक भूनिये, इसके बाद, उपरोक्त विधि के अनुसार सब्जी बना लीजिए.

Sunday, May 12, 2019

तलाक़

अफरोज भाई की पोस्ट
😢कागज का एक टुकड़ा✍️

राधिका और नवीन को आज तलाक के कागज मिल गए थे। दोनो साथ ही कोर्ट से बाहर निकले। दोनो के परिजन साथ थे और उनके चेहरे पर विजय और सुकून के निशान साफ झलक रहे थे। चार साल की लंबी लड़ाई के बाद आज फैसला हो गया था।
दस साल हो गए थे शादी को मग़र साथ मे छः साल ही रह पाए थे।
चार साल तो तलाक की कार्यवाही में लग गए।
राधिका के हाथ मे दहेज के समान की लिस्ट थी जो अभी नवीन के घर से लेना था और नवीन के हाथ मे गहनों की लिस्ट थी जो राधिका से लेने थे।

साथ मे कोर्ट का यह आदेश भी था कि नवीन  दस लाख रुपये की राशि एकमुश्त राधिका को चुकाएगा।

राधिका और नवीन दोनो एक ही टेम्पो में बैठकर नवीन के घर पहुंचे।  दहेज में दिए समान की निशानदेही राधिका को करनी थी।
इसलिए चार वर्ष बाद ससुराल जा रही थी। आखरी बार बस उसके बाद कभी नही आना था उधर।

सभी परिजन अपने अपने घर जा चुके थे। बस तीन प्राणी बचे थे।नवीन, राधिका और राधिका की माता जी।

नवीन घर मे अकेला ही रहता था।  मां-बाप और भाई आज भी गांव में ही रहते हैं।

राधिका और नवीन का इकलौता बेटा जो अभी सात वर्ष का है कोर्ट के फैसले के अनुसार बालिग होने तक वह राधिका के पास ही रहेगा। नवीन महीने में एक बार उससे मिल सकता है।
घर मे प्रवेश करते ही पुरानी यादें ताज़ी हो गई। कितनी मेहनत से सजाया था इसको राधिका ने। एक एक चीज में उसकी जान बसी थी। सब कुछ उसकी आँखों के सामने बना था।एक एक ईंट से  धीरे धीरे बनते घरोंदे को पूरा होते देखा था उसने।
सपनो का घर था उसका। कितनी शिद्दत से नवीन ने उसके सपने को पूरा किया था।
नवीन थकाहारा सा सोफे पर पसर गया। बोला "ले लो जो कुछ भी चाहिए मैं तुझे नही रोकूंगा"
राधिका ने अब गौर से नवीन को देखा। चार साल में कितना बदल गया है। बालों में सफेदी झांकने लगी है। शरीर पहले से आधा रह गया है। चार साल में चेहरे की रौनक गायब हो गई।

वह स्टोर रूम की तरफ बढ़ी जहाँ उसके दहेज का अधिकतर  समान पड़ा था। सामान ओल्ड फैशन का था इसलिए कबाड़ की तरह स्टोर रूम में डाल दिया था। मिला भी कितना था उसको दहेज। प्रेम विवाह था दोनो का। घर वाले तो मजबूरी में साथ हुए थे।
प्रेम विवाह था तभी तो नजर लग गई किसी की। क्योंकि प्रेमी जोड़ी को हर कोई टूटता हुआ देखना चाहता है।
बस एक बार पीकर बहक गया था नवीन। हाथ उठा बैठा था उसपर। बस वो गुस्से में मायके चली गई थी।
फिर चला था लगाने सिखाने का दौर । इधर नवीन के भाई भाभी और उधर राधिका की माँ। नोबत कोर्ट तक जा पहुंची और तलाक हो गया।

न राधिका लौटी और न नवीन लाने गया।

राधिका की माँ बोली" कहाँ है तेरा सामान? इधर तो नही दिखता। बेच दिया होगा इस शराबी ने ?"

"चुप रहो माँ"
राधिका को न जाने क्यों नवीन को उसके मुँह पर शराबी कहना अच्छा नही लगा।

फिर स्टोर रूम में पड़े सामान को एक एक कर लिस्ट में मिलाया गया।
बाकी कमरों से भी लिस्ट का सामान उठा लिया गया।
राधिका ने सिर्फ अपना सामान लिया नवीन के समान को छुवा भी नही।  फिर राधिका ने नवीन को गहनों से भरा बैग पकड़ा दिया।
नवीन ने बैग वापस राधिका को दे दिया " रखलो, मुझे नही चाहिए काम आएगें तेरे मुसीबत में ।"

गहनों की किम्मत 15 लाख से कम नही थी।
"क्यूँ, कोर्ट में तो तुम्हरा वकील कितनी दफा गहने-गहने चिल्ला रहा था"
"कोर्ट की बात कोर्ट में खत्म हो गई, राधिका। वहाँ तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा जानवर और शराबी साबित किया गया है।"
सुनकर राधिका की माँ ने नाक भों चढ़ाई।

"नही चाहिए।
वो दस लाख भी नही चाहिए"

"क्यूँ?" कहकर नवीन सोफे से खड़ा हो गया।

"बस यूँ ही" राधिका ने मुँह फेर लिया।

"इतनी बड़ी जिंदगी पड़ी है कैसे काटोगी? ले जाओ,,, काम आएगें।"

इतना कह कर नवीन ने भी मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया। शायद आंखों में कुछ उमड़ा होगा जिसे छुपाना भी जरूरी था।

राधिका की माता जी गाड़ी वाले को फोन करने में व्यस्त थी।

राधिका को मौका मिल गया। वो नवीन के पीछे उस कमरे में चली गई।

वो रो रहा था। अजीब सा मुँह बना कर।  जैसे भीतर के सैलाब को दबाने दबाने की जद्दोजहद कर रहा हो। राधिका ने उसे कभी रोते हुए नही देखा था। आज पहली बार देखा न जाने क्यों दिल को कुछ सुकून सा मिला।

मग़र ज्यादा भावुक नही हुई।

सधे अंदाज में बोली "इतनी फिक्र थी तो क्यों दिया तलाक?"

"मैंने नही तलाक तुमने दिया"

"दस्तखत तो तुमने भी किए"

"माफी नही माँग सकते थे?"

"मौका कब दिया तुम्हारे घर वालों ने। जब भी फोन किया काट दिया।"

"घर भी आ सकते थे"?

"हिम्मत नही थी?"

राधिका की माँ आ गई। वो उसका हाथ पकड़ कर बाहर ले गई। "अब क्यों मुँह लग रही है इसके? अब तो रिश्ता भी खत्म हो गया"

मां-बेटी बाहर बरामदे में सोफे पर बैठकर गाड़ी का इंतजार करने लगी।
राधिका के भीतर भी कुछ टूट रहा था। दिल बैठा जा रहा था। वो सुन्न सी पड़ती जा रही थी। जिस सोफे पर बैठी थी उसे गौर से देखने लगी। कैसे कैसे बचत कर के उसने और नवीन ने वो सोफा खरीदा था। पूरे शहर में घूमी तब यह पसन्द आया था।"

फिर उसकी नजर सामने तुलसी के सूखे पौधे पर गई। कितनी शिद्दत से देखभाल किया करती थी। उसके साथ तुलसी भी घर छोड़ गई।

घबराहट और बढ़ी तो वह फिर से उठ कर भीतर चली गई। माँ ने पीछे से पुकारा मग़र उसने अनसुना कर दिया। नवीन बेड पर उल्टे मुंह पड़ा था। एक बार तो उसे दया आई उस पर। मग़र  वह जानती थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो चुका है इसलिए उसे भावुक नही होना है।

उसने सरसरी नजर से कमरे को देखा। अस्त व्यस्त हो गया है पूरा कमरा। कहीं कंही तो मकड़ी के जाले झूल रहे हैं।

कितनी नफरत थी उसे मकड़ी के जालों से?

फिर उसकी नजर चारों और लगी उन फोटो पर गई जिनमे वो नवीन से लिपट कर मुस्करा रही थी।
कितने सुनहरे दिन थे वो।

इतने में माँ फिर आ गई। हाथ पकड़ कर फिर उसे बाहर ले गई।

बाहर गाड़ी आ गई थी। सामान गाड़ी में डाला जा रहा था। राधिका सुन सी बैठी थी। नवीन गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर आ गया।
अचानक नवीन कान पकड़ कर घुटनो के बल बैठ गया।
बोला--" मत जाओ,,, माफ कर दो"
शायद यही वो शब्द थे जिन्हें सुनने के लिए चार साल से तड़प रही थी। सब्र के सारे बांध एक साथ टूट गए। राधिका ने कोर्ट के फैसले का कागज निकाला और फाड़ दिया ।
और मां कुछ कहती उससे पहले ही लिपट गई नवीन से। साथ मे दोनो बुरी तरह रोते जा रहे थे।
दूर खड़ी राधिका की माँ समझ गई कि
कोर्ट का आदेश दिलों के सामने कागज से ज्यादा कुछ नही।
काश उनको पहले मिलने दिया होता?

Saturday, April 13, 2019

नचनिया

#नचनियाँ
*********

" डोंट टच मी ..सिक्योरिटी व्हेर आर यू ? "

उसके बाद जो हुआ उसने मेरी पसलियाँ ही खोल दी ..वो गन्दा -मटमैला ..बदबूदार बूढ़ा वहीं  गला चाक़ू से रेत गया ....

लहू का एक फुव्वारा उसकी गर्दन से छूटा और उसके बाद उसने जमीन पर एड़िया घिसनी शुरू कर दी ...कुछ 10 मिनट तक उसके जिस्म में हरकत दौड़ती रही ...और फिर सब खामोश .....उसका शव तो एम्बुलैंस ले गई लेकिन छोड़ गई कई सवाल भी ।

आज की बेहद डिमांडबल फ़िल्मी अभिनेत्री " दामनी " जी का बॉडी गार्ड हूँ मैं ...उनको टच करने वाला मेरा जानी दुश्मन होता है ..बहुत प्यार करता हूँ मैं उनसे ...तब से जब से उनका कमर हिलाने का फर्स्ट वीडियो मेरे मोबाईल में डाउनलोड हुआ ...

बड़ा श्रम ..बड़े सोर्स और मोटा पैसा लगाया मैंने कि मैं उन के करीब पहुँच सकूँ ..ताकि एक दिन उन्हें जता -बता सकूँ कि वो मेरी जिंदगी हैं ।

मैंने कई मनचलों के हाथों की अंगुलियाँ चटकाई हैं जिन्होंने भी उनको छूने की जुर्रत की ...मुझे आज भी याद है वो वाक्या जब खचाखच भीड़ में किसी नशेड़ी ने उनके सीने पर हाथ  मारा था ... कुल 3 किमी. दौड़ा था उसके पीछे और उसका वो हाथ ही कंधे से चटका दिया था मैंने .....

लेकिन पता नही इस बूढ़े पर मुझे क्रोध क्यूँ नही आया ...खैर दामिनी जी से मेरा इश्क इसलिए भी गहराता गया की उन्होंने कड़े संघर्ष के बाद अपनी राह बनाकर अपनी मंजिल पाई है .....

और लोग कहते हैं कि एक छमिया  मर्दों के सामने नाच कर ..उनसे सम्बन्ध दर , सम्बन्ध बनाकर यहाँ तक पहुँची है ...

लेकिन मैं सुधाकर प्रश्न करता हूँ कि ..कहाँ थे  फिर वो मर्द जो आज उनपर तोहमत लगाते है ...क्यूँ नही रोका उन्होंने ये निजाम ...जिस देश में हर कन्या में दुर्गा बसती है उसी देश के मर्द एक कन्या को खटिया-टोटे में बैठकर नचाते हैं ...कहाँ थे वो नारीवादी थोथे विचारक जब भरी महफ़िलों में दामिनी जी के अंगों को लोग निहारते थे और लार टपकाते थे ..कहाँ थी वो फेमिनिस्ट जो किसी बच्ची या युवती के साथ रेप होने के बाद मोमबत्तियां लिए सड़कों पर मिलती है ..कि क्यूँ नही आवाज बुलन्द की उन्होंने तब , जब नाचती हुई दामनी जी पर लोग झुण्ड बनाकर टूट पड़ते थे ...असल में एक अबला की मजबूरी का सबने फायदा उठाया ..वो अबला ,असहाय जिसका मेरे सिवा कोई हितैषी नही ...वो अनाथ लड़की जिसने अपना कद और नाम बनाने के लिए अपना जिस्म और उसकी थिरकन भी लोगों के सामने दाँव पर लगाई है ...

" आई लव यू दामिनी जी ..मैं आपके बिना नही रही रह सकता "

रात भर शराब के नशे में अक्सर यही बड़बड़ाता हूँ और फिर ऐसे ही आँख लग जाती है ।

लेकिन सुबह जब सेव कर रहा था तब न जाने क्योंकर लापरवाही से गाल में कट लग गया और खून निकल आया ...जैसे ही मैंने  उस खून की बूँद को अँगुली के पोरे से छुआ मुझे कल की घटना याद आ गई ...और न जाने क्यूँ एकदम से उबकाई आ गई ...इतनी तेज मितली कि पेट का सब वाशबेसिन पर उड़ेल दिया ....

कुछ देर बाद राहत मिली और दामिनी जी के पी.ए का फोन आया कि आज मैडम रेस्ट करेंगी ..नो शूटिंग ..नो प्रोग्राम ...

आज छुट्टी थी लेकिन गाल का कट अब भी चुभ रहा था ...न जाने क्यूँ मैंने वैसी ही हालत में स्पोर्ट्स शूज पैर में डाले और घर को लॉक कर निकल गया ...

" हैलो सर ..वो कल ..वो जो आदमी ने खुद का गला काटा कौन था ...कुछ पता चला ...जी मैं दामिनी जी का बोडीगार्ड सुधाकर सिन्हा !"

" जी ...कोई आत्माराम हैं..कुर्ते की जेब में आधार कार्ड मिला है इनके ...बाकि टीम भेजने वाले हैं इनके गाँव सुरई गाँव में ...बाई दी वे आप अपना नम्बर दे दें ..जैसे ही कुछ पता चलता है हम आपको बताते हैं "

फ़्लैट में लौटा ..और बाथ लिया ...जिम जाने की जगह मैंने कार का बोनट सुरई गाँव की ओर टांका और एक्सीलरेटर दाबा ....

जहन में कोई सवाल नही था ...क्यूँ सुरई गाँव जा रहा हूँ ..पता नही था ..बस एक ख़ामोशी थी ...जिसे मैंने दामनी जी पर फिल्माए एक एक गाने से कुछ हद तक कम किया ...लेकिन जियादह देर तलक फिर उसे भी न सुन पाया ...

" ए भैया ..ये सुरई गाँव के लिए कौनसी सड़क जायेगी ...?"

" ई आगे जाकर ..पहिला कच्चा मिट्टी का रास्ता लगता है बाबूजी ..."

रास्ता यकीनन मिट्टी का था ...इतनी मिट्टी ..इतनी धूल की मुझे कार के शीशे बन्द करने पड़े ..लेकिन तभी कार का पिछला टायर एक गड्ढे में जा फंसा ...और बड़ी मशक्कत के बाद भी वो नही निकला ...मदद के लिए दूर तलक कोई नही था ..मैंने कार वहीँ लॉक की और खुद से कई बार सवाल किया कि आगे बढ़ा जाये या पीछे लौटा जाये ....

खैर सिक्का उछाला और बन्द मुट्ठी में उसे देख कर कुछ देर खामोश रहने के बाद सुरई गाँव तक पैदल पहुँचने पर अपना पहला कदम आगे फेंका ...

जितना आगे बढ़ता गया ...उतना दिमाग उकताता गया ,,,, हर तरफ वीरान -बंजर खेत ...दूर -दूर तलक कोई आबादी नही लेकिन कुछ घास -फूस  के कच्चे मकान भी नजर आये ..... एक जगह तेज बदबू से उबकाई आते-आते रही ...गिद्धों का झुण्ड एक मरे बैल को नोच रहा था ....पानी  बोटल में खत्म होने की कगार पर ...और गर्मी इस कदर जैसे मैं सूरज की जमीन पर उतर गया हूँ ....

खेत तो खेत . ..शजर (पेड़ ) भी सूखे ...और घास भी ...हर तरफ एक मातम करता नजारा ...

तभी मुझे पास एक घर दिखा ....मैंने वहाँ पहुँचकर जब आवाज लगाई ..तो एक जिन्दा लाश ने दरवाजा खोला ..महज पसलियों को पहना वो आदमी सिर्फ गुप्तांग ढँका हुआ था ....उसके दो बच्चे मिट्टी से लीपी जमीन पर लेटे थे...और उसकी लुगाई खड़ी घास के कण्डे बुन रही थी ...

" भैया जी ये सुरई गाँव कितना दूर है .?"

" बाबू ई कुछ एक मील अउर ..."

" पानी मिलेगा ....प्यास बहुत लगी है ..."

" बाबू ..4 मील दूर से पानी लाते हैं ...और वो भी एक तालाब का ..थोड़ा मटमैला है ...पी सकेंगे का ..?

पानी की शक्ल देखकर पता लगा कि ये लोग रोज पानी के नाम पर जहर पी रहें है ...मरता क्या न करता ...अपने रुमाल से छान कर उस पानी को अपनी बॉटल में भरा और आगे बढ़ा ...

सुरई गाँव मेरे सामने खड़ा था ...दौड़ती मेट्रो ..एयरवेज ..बसेज ..और चाँद -सितारों पर पहुँचने वाला देश ..वो देश जहाँ छोटी से छोटी मीटिंग्स में बोतल बन्द पानी से कुल्ला किया जाता है ...ऐसा देश जो नदियाँ का स्वर्ग है ..वहाँ एक बूँद साफ़ पानी भी इन  इंसानों को मयस्सर नही ....

लगभग घर सूने ...उदास ..बंजर ...जहाँ लोगों के जिस्म इस कदर कुपोषित की मौत किसी भी घर बस घात लगाये बैठी है ...जहाँ कपड़ों के नाम पर महज चीथड़े ...और  देश में जहाँ नेता-अभिनेता हर दूसरे पहर एक बार उतारा कपड़ा दुबारा जिस्म में नही चढ़ने देते ...

" ए भाई ये आत्माराम का घर कहाँ हैं ..?"

" ई तो रहा ..उ नाही है इहाँ . "

आत्माराम का घर ..घर नही एक पिंजरा था ..जिसमें एक टूटी उदास बुढ़िया घास की मोजोल बोरे में भर के उसके ऊपर लेटी थी ....घर में उसके सिवा सिर्फ मिट्टी के कुछ बर्तन थे और धातु कहने में एक स्टील का छोटा कुकर ....

" आ गवे का ..लच्छी के बापू ...?"

आँख से बैठ गई थी वो औरत ..मैंने उससे बात न करके एक आदमी को पकड़ा ...उसे 100 का एक नोट दिया और उसने बताया ...

कि कभी ये गाँव हँसता-खेलता और फलता -फूलता था ..लेकिन कुछ साल पहले के अकाल ने इस गाँव की रौनक और आबादी को निगल लिया ...तालाब सूख गये ..कुल मिलाकर 12 -15 जन है यहाँ इसलिए अब नेता भी यहाँ नही आते ...वरना पहले अक्सर चुनाव में यहाँ पैसा भी बँटता था और उम्मीदें भी ....

ये गाँव किसानों की आत्महत्या का गढ़ है ..यहाँ हर कदम पर किसानों ने अपनी जानें दी है ..और उसके बाद हर दूसरा कदम उनके परिवार की जानों का गवाह है ....

आत्माराम की तीन बेटियाँ थी ... और तीन खेत भी ...एक बचपन में सामूहिक बलात्कार का शिकार होकर जान गंवा बैठी ...दूजी ने उँची जात पर प्रेम करने की सजा पाई ..तीसरी लच्छी जिसका कोई अता -पता नही

मैंने जोर देकर पूछा मतलब क्या हुआ था ....उसके साथ

" नाचती थी पहिले गाँव की ब्याह -बारात में ...फिर सरपंच ने अपने घर रख लिया ...फिर अपने साथ शहर ले गए ...पता चला था कि वो भी बीमारी के चलते नही रही फिर पता नही जो हुआ राम जाने "

खटका तो हुआ ...और मैंने सीधे आत्माराम की झोपड़ी में प्रवेश किया ...और इधर-उधर झाँका -ताँका ..एक लकड़ी का सन्दूक मिला ...उसको खोला बुढ़िया चिल्लाती रही ....और हाथ लगी एक पुरानी फोटो ...जिसमें आत्माराम एक मेले में अपने परिवार संग खड़े हैं ....लेकिन उस परिवार  में एक की शक्ल बता रही थी कि वो दामनी है ...यानि लच्छी .....

" कौन है ये लच्छी ..?."

बुढ़िया ने बाताया उसकी सबसे छोटी बेटी जो बड़े शहर में एक बड़ी नचनिया बन गई है ..पैसे भी खूब बनाती है ..सनीमा में आती है ...उसके बापू को जब पता चला तो उसके पास गए ..उसने दूई बार पहचानने से मना किया और एक बार धक्का और धमकी देकर घर से निकलवा दिया ...लेकिन वो शायद पहचानी नही होगी ...इसलिए इस बार फिर मिलने गए हैं ...जो था सब बिक चुका है शहर आने-जाने में ...जानते हैं कि उसका सनीमा देखने वालो को पता लगेगा तो इसकी इज्जत खराब होगी लेकिन कुछ मदद कर दे पैसे टके से तो और जी ले...खाने को अनाज का एक तिनका नही ..और पीने को एक चुल्लू पानी नही ....

सब समझ गया ...सब कुछ ...आक थू .. दिल गवाही दे रहा था कि ..नचनिया अपनी मजबूरी से नही बल्कि अपने शौक से बनी लच्छी ... मर्दों के सामने अपनी इज्जत उसने खुद नीलाम करवाई ..और वो भी वहाँ तक पहुँचने के लिए जहाँ भारत के घर की  मासूम बच्चियों की वो डांस आइडियल बन सके ...वो बच्चियां जिनके कदम स्कूल ..कॉलेजेज और अपनी बेहतरी की जानिब उठे ...मर्दों के सामने नाचने के लिये नही ... ये आज के भारत के बच्चे और युवा जो ये समझ बैठे हैं कि असली फेम और नाम यूँ अपने जिस्मों को बेहयाई से किसी फूहड़ गीत में झूमाने से वो स्टार बन सकतें हैं तो वो सच ही सोचते हैं क्यूँकि हम माता -पिता उन्हें खुद उन नजरों और इरादों को सौंप रहे हैं जिनका धंधा भारत की युवा शक्ति को पद भ्रष्ट करने पर टिका है .. नृत्य पाप नही बल्कि ये एक कैफियत है ...नटराज से लेकर सूफियत भी इसपर आश्रित है लेकिन एक सवाल उन युवाओं ..नेताओं और अभिनेताओं से.. कि संस्कृति ने हमें सीखाया कि वृद्ध माँ -बाप की सेवा व्यक्ति का धर्म ही नही अपितु कर्तव्य भी है ...मजहब कहता है कि इनकी खिदमत करने वाले से ख़ुदा राजी तो फिर अगर ये युवा सिर्फ इसलिए सशंकित है कि माता-पिता की गरीबी ..दीनता और पुरानापन उनकी मॉडर्निटी के बीच का रोड़ा है तो फिर आइये हम एक नई इबारत मिलकर लिखें कि किसान ,,युवाशक्ति ..मजदूर और शोषित का नही बल्कि ये मुल्क अब नचईयों और  समाज को विकृत करते  परजीवियों की महत्वकांक्षाओं का एक मंच मात्र बन गया है ।।।।।

दामिनी दिल से उतर चुकी थी ...और उसकी माँ अब मेरे साथ कार में थी ...मुझे नही पता कि अब जिंदगी दामिनी के बगैर क्या होगी लेकिन मुमकिन है ...कि जिंदगी एक माँ के साथ जन्नत है बजाय एक बाजारू नचनिया और बेगैरत औलाद के साथ से ।।।

सिक्का जिसने  हथेली पर गिरते ही रोका था सुरईगाँव जाने से.. उसे फिर वहीँ चलती कार से फेंक आया .....

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan