परवाज़ भाग १
वह अपना कैरियर बनाना चाहती थी लेकिन उसका पति पुराने विचारों का था उसकी सोच थी कि औरत सिर्फ बच्चे जनने और घर संभालने की मशीन है।
संध्या नाम था उसका साधारण खूबसुरत गठीला बदन गोरा रंग लंबा क़द कोई कमी नहीं थी उसमें पढ़ने में भी तेज़। डाॅ. बनने का सपना था पर उसका ग़रीब परिवार से थी बाप मिल मजदुर था चार बच्चों में सबसे छोटी थी और वो भी लड़की ज़ात। उसका पालन पोषण वैसे ही हुआ जैसे आम भारतीय परिवारों में होता है तीन तीन भाइयों के होते हुए उसको कोई प्यार नहीं करता था। और न मां बाप ज़्यादा परवाह करते थे।
सरकारी स्कूल में हाईस्कूल तक ही पढ़ पायी थी मां बाप शादी करके घर से निकाल फुर्सत होना चाहते थे। तीनों बड़े भाई बमुश्किल इंटर पास करके मज़दूरी करने लगे थे। बहन की शादी के लिए बड़ी मुश्किल से थोड़ा धन जुटा पाये थे।
अंततः नियति के आगे किसी की नहीं चलती सपनों के राजकुमार के सपने मन संजोये हुए संध्या की शादी एक ग़रीब घर में हो गयी। रमेश उसका पति सामान्य क़द काठी सांवला और दुबला पतला लड़का था। सुहागरात वाले दिन ही रमेश को देखकर वो अपने भाग्य को कोसने लगी। परंतु धीरे-धीरे उसने हालात से समझौता कर रमेश को अपना पति मानना ही पड़ा।
समय धीरे-धीरे पंख लगाकर उड़ता रहा ग़रीबी और तंगी के चलते संध्या परेशान रहने लगी। बड़ा परिवार और कमाने वाले दो पति की तरह ससुरजी भी मज़दूरी करते थे। तब जाकर परिवार की गाड़ी चलती थी। दो ननदों की शादी की भी टेंशन थी इंहीं सब परेशानियों को देखते हुए वो अपना मां बनना टालती जा रही थी। घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए संध्या ने नौकरी करने की इच्छा ज़ाहिर की। परंतु रमेश और उसके परिवारवाले राज़ी नहीं थे। एक समय का लेंगे पर बहुत बेटी से नौकरी नहीं करायेंगे।
इस बात को लेकर कइ बार घर में झगड़े होने लगे, समय का चक्र चला और संध्या ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया और वो दो प्यारे प्यारे बच्चों की मां बन गयी। घर ख़र्चे बढ़े तो रमेश देर रात तक मज़दूरी करने लगा, देर रात घर से बाहर रहने की वजह से रमेश को शराब की लत लग गई। इधर रमेश की दोनों बहनें शादी की उम्र पार कर गयीं। बड़ी बहन रेखा का पड़ोस के लड़के से चक्कर चला और वो गर्भवती हो गयी। पिताजी ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर सके और खाट पकड़ ली। बड़े-बड़े डाॅक्टरों को दिखाया पर कुछ नहीं हुआ। कमाने वाला एक कम हुआ तो घर में खाने के लाले पड़ गए उस पर बहन की बदनामी संध्या जीवन नर्क बन गया बच्चों को भी भूखा सुलाना पड़ रहा था।
रमेश नौकरी के पक्ष में अभी भी नहीं था थक-हारकर संध्या घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का विचार किया तो कोई भी अभिभावक संध्या के घर ट्यूशन पढ़ने अपने बच्चों को भेजने को तैयार नहीं हुआ। कुछ ही दिनों में ससुरजी चल बसे। हालात सुधर नहीं रहे थे। बदनामी और लोगों के तानों से परेशान रेखा घर छोड़कर भाग गई।
एक रोज़ रमेश के काम से घर लौटते समय एक्सिडेंट हो गया रमेश ने खटिया पकड़ी तो अब संध्या के पास परिवार का पेट पालने और पति के इलाज के लिए घर से बाहर निकलकर नौकरी करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा।
थोड़ी दौड़ धूप करने पर नौकरी मिल गई तनख्वाह तो ज़्यादा नहीं थी पर इसके सिवा कोई रास्ता नहीं था। दफ्तर भी घर से बहुत दूर था लेकिन क्या करती। परिवार का पेट पालने के लिए नौकरी करनी पड़ी।
क्रमश: