Tuesday, October 22, 2019

बूढ़ी दादी

बूढ़ी दादी

बनारस में एक चर्चित दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब दोस्त-यार आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की बुजुर्ग स्त्री पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई।

उनकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी। नेत्र भीतर को धंसे हुए किन्तु सजल थे। उनको देखकर मन मे न जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया,

"दादी लस्सी पियोगी ?"

मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक। क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 25 रुपए की एक है। इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी दादी के द्वारा मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी।

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए। मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा,

"ये किस लिए?"

"इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी !"

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था... रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी।

एकाएक मेरी आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा... उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गई।

अब मुझे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका।

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे.....कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये... लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी.....

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम सब मित्रों और बूढ़ी दादी के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पास ही जमीन पर बैठ गया क्योंकि ऐसा करने के लिए तो मैं स्वतंत्र था...इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती थी... हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा... लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा,

"ऊपर बैठ जाइए साहब! मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं किन्तु इंसान कभी-कभार ही आता है।"

अब सबके हाथों मे लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर सहज मुस्कुराहट थी, बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसू, होंठों पर मलाई के कुछ अंश और दिल में सैकड़ों दुआएं थीं।

न जानें क्यों जब कभी हमें 10-20 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उसपर खर्च करने होते हैं तो वो हमें बहुत ज्यादा लगते हैं लेकिन सोचिए कि क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं?

क्या कभी भी उन रुपयों को बीयर , सिगरेट ,पर खर्च कर ऐसी दुआएं खरीदी जा सकती हैं?

जब कभी अवसर मिले ऐसे दयापूर्ण और करुणामय काम करते रहें भले ही कोई अभी आपका साथ दे या ना दे, समर्थन करे ना करें। सच मानिए इससे आपको जो आत्मिक सुख मिलेगा वह अमूल्य है।

Tuesday, October 8, 2019

रावण

रावण से अचानक ही भेंट हो गयी मेरी ! ये घास फूस और पटाखे भरा रावण नही था ! सच्ची मुच्ची का रावण था ! कम हाईट का , बैचैन सा ,दशहरा मैदान की मेले की भीड मे भटकता रावण ! वैसे तो उसे बतौर रावण पहचान पाना नामुमकिन ही था ! रावण को जलते देखने आई भीड मे अक़ेला छूट गया बच्चा ही लगा मुझे वो ! मुझे लगा अपने गार्जियन की ऊँगली छूट जाने से इस खो गये बच्चे की मदद करना ही चाहिये !
जाहिर है मैने उससे उसका नाम पता जानना चाहा ! जवाब मिला रावण ! रावण ! आज के ज़माने मे अपने बच्चे का नाम रावण कौन रखता है ! ग़ौर से देखने पर मैने पाया कि वो लगने के बावजूद बच्चा है नही ! अच्छा खासा अधेड़ बंदा है ! पूछताछ करने पर और बतौर आईडियेन्टिटी उसकी जली नाभि देखने के बाद ही तस्दीक़ हो सकी कि ये बालक सा दिखता आदमी लंका का राजा रह चुका रावण ही है !
पर आप तो किसी कोण से रावण नही दिखते ! हमारी धार्मिक किताबे तो बताती है रावण हट्टा कट्टा गामा पहलवान टाईप बंदा था !
वैसा ही था मै !
था मतलब !
आप के जमाने मे मुझसे बेहतर रावण के इतने एडीशन आ चुके कि मारे शर्मिंदगी के ऐसा छोटा हो चला हूँ मै !
पर हम तो हर साल इस घास फूस वाले रावण को चार छह फ़ुट और ऊँचा कर देते है !
वो मै नही ! वो तुम खुद हो ! तुम्हारा मन खुद मंजूर करता है कि अनाचार और बुराइयाँ पिछले साल से ज्यादा बढी है ,नतीजन इस पुतले की हाईट अपने आप बढ जाती है !
पर आपके बारे मे तो खबर यही है कि दस सर थे आपके !
दस सर जैसी कोई बात कभी नही थी ! लोगो का मानना था कि दस आदमियो जितनी बुद्धि थी मेरे पास ,इसलिये लिखने वालो ने यह बात बना ली !
पर आप इतने परेशान से क्यो हैं !
मै अपनी पहचान छोटी होते देखकर परेशान हूँ ! हिंदुस्तान मे लाखो लाख ऐसे फिर रहे है जो दस से ज्यादा चेहरे लगाये हुये है ! वो वक्त जरूरत जंचने वाला चेहरा लेकर सोसायटी से मुखातिब होते है ! उनके कारनामे मुझे मात करने वाले है !
अब ऐसा क्या कर दिया हम लोगो ने !
अब हँसा रावण ! हाँलाकि उसकी हँसी वैसी कतई नही थी जैसा वो फ़िल्मों और टीवी स्क्रीन पर हँसते देखा जाता है ! आँसुओं से भीगी हँसी थी ये ,और इस हँसी के बावजूद वो रावण ही था !
क्या नही किया आप लोगो ने ! क्या नही कर रहे आप लोग ! लडकियो को पैदा होने के पहले मारने वाले लोग है आप लोग ! क्या आपकी राजधानी मे कोई लडकी शाम को सड़कों पर बिना डरे अकेली आ जा सकती है ! आपके शहरों मे कुछ मकान सोने के और कुछ फूस के है पर आप इसे लेकर शर्मिंदा नही है ! अनगिनत भूखे लोगो के बीच कुछ लोग ज्यादा खाने की वजह से मर रहे है पर आपको यह बात अजीब नही लगती ! आप खुद डरे हुये है और सब को डरा कर रखना चाहते है ! जमीन ,जंगल ,नदियाँ ,पहाड़ सब कुछ खा जाने की आपकी भूख मुझे लज्जित करती है ! आपके जमाने मे साँस लेने तक के लिये साफ हवा हासिल नही ! आप वो लोग है जो किसी भी दूसरे आदमी को उसके विचारों ,उसके धर्म ,उसके कपड़ों या उसके खाने की थाली को देख कर ही उसे मार देने का फैसला कर सकते हैं ! और ऐसा करने के बाद भी आपकी आत्मा आपको धिक्कारती नही ! मेरे वक्त ऐसा नही था ! ना ऐसी सोच रखने वाले ही आसपास थे मेरे ! मेरे राज्य मे सभी निर्भय और सुखी थे ! मैने कभी सिद्धान्तों से समझौता नही किया ! मै पीठ पीछे वार करने वालो मे से नही था ! मै वो था जो अपने शत्रु को भी सच्चे मन से विजयी होने का आशीर्वाद दे सकता था ! सही बात तो ये है कि आप नफरत की खाद पर पलते खतपतवार से है ! लालची ,कायर ,बडी बडी बाते करने वाले छोटे लोग है आप लोग ,जो मेरे पुतले को जलाने का तमाशा भर कर सकते है !
और फिर ,मुझे मारने खुद राम आये ! उनके आने से सम्मानित हुआ मै ! पर आप लोगो ने बुराई को भी उस निकृष्ट स्तर पर ला दिया है कि राम भी शायद दूर ही रहना चाहे आप लोगो से !
रावण सच मे नाराज था ! मै हक्का बक्का था ! शर्मिंदा होने की बारी अब मेरी थी ! भीड मे एक बार फिर खो गये रावण की ऐसी खरी खरी सुनने के बाद मै एक ही काम कर सकता था ,और वही किया मैने ! मै रावण दहन के पहले ही घर लौट आया !