खटनपुर गाँव में जमींदारों के ज़माने से एक प्रथा चली आ रही थी कि वो अपने ऐशो- आराम और मनोरंजन के लिए गाँव के किसी भी परिवार में कोई सुंदर लड़की पैदा होती तो उसे उठवा लिया करते और छोटी हवेली में ही उसकी परवरिश करते १८ वर्ष तक उसे पाल पोस कर बड़ा किया जाता नृत्य आदि की शिक्षा के साथ नाज़-नख़रे तथा उठने बैठने के सलीके भी सिखाये जाते.यह सब सिखाने में मुख्य भूमिका वहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी रह रहीं उसी गाँव की औरतें हुआ करतीं जिन्हें उनके बचपन में ही छोटी हवेली में लाया गया था. यह प्रथा सदियों से चली आ रही थी जिससे डर कर जैसे ही गाँव के किसी परिवार में कोई बहू के माँ बनने का पता चलता परिवार वाले उसे मायके भेज देते.अगर बेटा पैदा होता तो बहू बच्चे को ले कर वापस अपने माता-पिता के गाँव आ जाती, बेटी पैदा होने पर या तो उसे किसी रिश्तेदार के यहाँ छोड़ दिया जाता या बहू के मायके में ही उसकी परवरिश होती और सयानी होने पर किसी दूसरे गाँव में ब्याह दी जाती. फिर भी कुछ गरीब परिवार भाग्य के भरोसे रह कर बहू को वहीं रहने देते और बेटा पैदा होने के लिए अंधविश्वासों का सहारा ले कर टोने टोटके करते पर बेटी पैदा होने पर जमींदार के आदमी फिर बच्ची को जबरदस्ती यह कह कर ले ही जाते थे कि उनके पास रहेगी तो उसके ब्याह में दहेज़ देना पड़ेगा,परवरिश भी करनी पड़ेगी,जमींदार जी के यहाँ रहेगी तो सब कुछ बिना चिंता के निबट जायेगा..इस तरह इक्का-दुक्का परिवारों से ही लडकियाँ जमींदार की छोटी हवेली में आ पातीं थीं.
जमींदार और उनका खानदान बड़ी हवेली में रहता था. छोटी हवेली और बड़ी हवेली के बीच केवल एक दीवार थी. पर दोनों हवेलियों का आने जाने का रास्ता अलग था.
यहाँ तक कि कोई खिड़की कोई दरवाज़ा एक दूसरे के आमने सामने नहीं पड़ता था, न तो छोटी हवेली से कोई बड़ी हवेली में झाँक सकता था न बड़ी हवेली का कोई बाशिंदा छोटी हवेली की ओर रुख़ कर सकता था. हाँ, आँगन की दीवार में एक झरोखा जरूर था जहाँ से चाँदनी रोहन को सितार बजाते छुप-छुप कर देखा करती थी.
कभी सितार की झंकार सुनते ही उसके पैर अनायास ही थिरक उठते और वह झूम- झूम कर नाच उठती.
रोहन जमींदार का बेटा था.चाँदनी को पैदा होते ही गाँव के ही एक परिवार से लाया गया था. वह जीवन के सोलह बसंत पार कर चुकी थी.पर छोटी उम्र से ही वह
झरोखे से छुप- छुप कर रोहन को देखा करती थी कभी सितार बजाते हुए,कभी बैडमिनटन खेलते हुए.पर अचानक ही बड़ी हवेली से सितार बजने की आवाज़ आनी बंद
हो गयी.जब काफी दिनों तक सितार नहीं बजी तो चाँदनी उदास रहने लगी.उसे समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हुआ?किसी से भी पूछ तक नहीं सकती थी बस टुकुर-टुकुर झरोखे से झाँका करती.असल में रोहन को पढ़ाई करने के लिए विदेश भेज दिया गया था. इधर समय बीतने के साथ चाँदनी की नृत्य की शिक्षा पूरी हुई और अट्ठारह बरस पूरे होने के उपलक्ष्य में गाँव की नदी पार की महलनुमा हवेली में जश्न मनाया जाने वाला था.जिसमे आस- पास के सभी गावों से जमींदार शहर के बड़े अफसर बुलाये गए थे. चाँदनी को पहली बार उस जश्न में अपना नृत्य पेश करना था.रोहन भी छुट्टियों में वहाँ एक दिन पहले ही पहुँचा था उसे भी जश्न में शामिल होने के लिए विशेष रूप से विदेश से बुलाया गया था.
जश्न में चाँदनी के नृत्य की पहली झलक में ही रोहन उसकी सुन्दरता पर मुग्ध हो गया.उसने नदी पार की हवेली के जश्न के बारे में सुना तो था पर उसके सामने यह जश्न
पहली बार हुआ था.हालाँकि वह चाँदनी की सुन्दरता पर मुग्ध तो हुआ था पर अपने ही खानदान में मनाई जाने वाली इस परंपरा के बारे में जान कर उसे अच्छा नहीं लगा. अपने घर के बड़े लोगों के सामने वह अपना मुँह नहीं खोल सकता था, ऐसी शिक्षा उसे बचपन से ही दी गयी थी. करे तो क्या करे.जश्न के बाद रात भर करवटें बदलता रहा.सुबह
होते ही अपना गिटार लेकर आँगन में आ गया चाँदनी भी नहा कर आँगन की कच्ची धूप में अपने लम्बे बाल सुखा रही थी.अचानक गिटार की मोहक धुन सुन कर उसने झरोखे से झाँक कर देखा.वहाँ रोहन को देख कर वह खुशी से झूम उठी और गिटार की धुन पर ही थिरकने लगी.रोहन इससे अनजान गिटार बजने में ही इतना व्यस्त था कि उसे पता ही नहीं चला कब उसकी उंगली गिटार के तार में फँस गयी और खून बहने लगा. नाचते-नाचते अचानक चाँदनी का ध्यान झरोखे की तरफ गया तो रोहन के हाथ से खून बहता देख वह 'उई माँ' ' कहते हुए जोर से चिल्ला उठी. उसके चिल्लाने से रोहन का ध्यान पहले अपने हाथ पर फिर झरोखे की तरफ गया. गिटार बजाना बंद कर वह झरोखे की तरफ गया. चाँदनी ने झट से अपना आँचल फाड़ कर काँपते हुए हाथों से रोहन के हाथ में पट्टी बाँध दी.दोनों की नज़रें मिलीं.चाँदनी के दिल की धड़कन तेज हो गयी और वह अपने आँचल में मुँह छुपा कर वहाँ से दूर
Tuesday, December 27, 2016
छोटी हवेली
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