Friday, January 8, 2016

हदीस

● शाब्दिक अर्थ : हदीस का शाब्दिक अर्थ है : बात, वाणी, बातचीत, गुफ़्तगू, ख़बर, क़िस्सा....।
● पारिभाषिक अर्थ : इस्लामी परिभाषा में ‘हदीस’, पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) के कथनों, कर्मों, कार्यों को कहते हैं। अर्थात् 40 वर्ष की उम्र में ईश्वर की ओर से सन्देष्टा, दूत (नबी, रसूल, पैग़म्बर) नियुक्त किए जाने के समय से, देहावसान तक, आप (सल्ल॰) ने जितनी बातें कीं, जितनी बातें दूसरों को बताईं, जो काम किए उन्हें हदीस कहा जाता है।
● परिचय : इस्लाम के मूल (ईश्वरीय) ग्रंथ क़ुरआन में अधिकतर विषयों पर जो रहनुमाई, आदेश-निर्देश, सिद्धांत, नियम, क़ानून, शिक्षाएँ, पिछली क़ौमों के वृत्तांत, रसूलों के आह्नान और सृष्टि व समाज से संबंधित बातों तथा एकेश्वरत्व के तर्क, अनेकेश्वरत्व के खंडन और परलोक-जीवन आदि की चर्चा हुई है वह संक्षेप में है। इन सब की विस्तृत व्याख्या का दायित्व ईश्वर ने पैग़म्बर (सल्ल॰) पर रखा।
पैग़म्बर (सल्ल॰) पर फ़रिश्ता जिबरील के माध्यम से अवतरित ‘वह्य’ (ईशप्रकाशना) क़ुरआन के रूप में थी। आप (सल्ल॰) पर दूसरे क़िस्म की वह्य भी अवरित होती थी, कभी हृदय में कोई बात डाल दी जाती, कभी स्वप्न में दिखा दी जाती, आदि। पैग़म्बर (सल्ल॰) के सारे काम इन दोनों प्रकार की वह्यों के अनुसार होते थे। यूँ पूरे पैग़म्बरीय जीवन-काल में आप (सल्ल॰) का संबंध हर समय, हर परिस्थिति में ईश्वर से स्थापित रहता था। आप (सल्ल॰) के हर काम, गतिविधि, बात और निर्णय को ईश्वर की स्वीकृति रहती थी। यही कारण है कि इस्लाम धर्म के मूल स्रोत क़ुरआन के बाद द्वितीय स्रोत ‘हदीस’ है। दोनों को मिलाकर इस्लाम धर्म की सम्पूर्ण व्याख्या होती है और इस्लामी शरीअत (जीवन-विधान) की संरचना होती है।
● हदीसों का प्रसार : इस्लाम का, हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के रसूल बनने के साथ उसके विशुद्ध रूप में जब पुनः आगमन हुआ उससे पहले के धर्म-ग्रथों में जो विकार आ गया था उसके कई कारणों में से एक यह भी था कि ईश-वाणी, रसूल के कथन और दूसरे इन्सानों व धर्माचार्यों, उपदेशकों, वाचकों, सुधारकों और धर्मविदों आदि के कथन भी आपस में मिल-जुल गए; ईशवाणी और मनुष्य-वाणी के मिश्रण में, मूल ईश-ग्रंथ कितना है, और इसके अंश कौन-कौन से हैं, यह जान सकना असंभव हो गया।
यह त्रुटि अन्तिम ईशग्रंथ ‘क़ुरआन’ में बिल्कुल ही न आने पाए (क्योंकि आगे सदा के लिए इसी ग्रंथ से मानव-जाति का मार्गदर्शन होना था तथा इसे हर प्रकार के विकार से सुरक्षित रखकर इस्लाम को शाश्वत रूप से मानवजाति का शुद्ध व विश्वसनीय धरोहर बनाया जाना था) इसलिए सामान्यतः आप (सल्ल॰) के कथनों को लिखित रूप में न लाया गया। आप (सल्ल॰) के आम साथी, और ऐसे साथी जो अधिकतर समय आपके प्रेम व श्रद्धा में तथा आप (सल्ल॰) से धर्म की बातें सुनने-सीखने के लिए आप (सल्ल॰) के समीप, या साथ रहते थे, आप (सल्ल॰) के कथनों (हदीसों) को, जो भी मिलता उससे बयान करते। आपके कर्मों और गतिविधियों को भी जगह-जगह बयान करते रहते। इस तरह आरंभ काल से लगभग दो शताब्दी तक यह क्रम चलता रहा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी, हदीसों का मौखिक प्रसार होता रहा। जो भी व्यक्ति हदीस बयान करता वह यह बात भी अवश्यतः बताता कि उसने वह बात सीधे हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) से सुनी या वह काम आप (सल्ल॰) को करते देखा है; या अमुक व्यक्ति से सुना है। इस तरह हदीस की विश्वसनीयता-हेतु हर हदीस के साथ उसे बयान करने वाले व्यक्ति, या आगे के सिलसिले में उसे बयान करने वाले व्यक्तियों के नामों (उनके पिता के नामों सहित) का बयान व प्रसार होता रहा (आगे चलकर इसी प्रसार-पद्धति से लाभ उठाकर हदीसों को लिखने, उनका संकलन व संग्रह करने का काम किया गया)। अरबों के बारे में सारे (मुस्लिम व ग़ैर-मुस्लिम) विद्वान, शोधकर्ता व इतिहासकार सहमत हैं कि उनकी स्मरण-शक्ति असामान्य रूप से अधिक तथा स्मरण-क्षमता बहुत ही तेज़ थी। वे अपनी लंबी-लंबी वंशावली भी याद रखने में निपुण होते थे।
हदीसें बयान करने वाले व्यक्तियों की संख्या हज़ारों में है। इन में पुरुष भी हैं और स्त्रियाँ भी; स्त्रिायों में विशेषतः पैग़म्बर (सल्ल॰) की पत्नियाँ। हदीस उल्लिखित करने वालों की श्रृंखलाओं में लगभग एक लाख लोगों के नाम आए हैं। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि चूँकि क़ुरआन (मूल ईशग्रंथ) के आदेशों, शिक्षाओं और नियमों की विस्तारपूर्ण व्याख्या ‘हदीस’ द्वारा ही होती थी इसीलिए हदीसों की शुद्धता को यक़ीनी बनाने का विषय अत्यंत नाज़ुक व संवेदनशील था। अतः (हदीस-संग्रह ‘बुख़ारी’ में, पैग़म्बर (सल्ल॰) के साथी हज़रत अबू सलमा (रज़ि॰) की बयान की गई) हदीस के मुताबिक़, आप (सल्ल॰) ने हदीस-वर्णनकर्ताओं को सख़्त चेतावनी दी थी कि ‘‘जो व्यक्ति मुझ से संबंध लगाकर वह बात कहे जो मैंने नहीं कही, वह अपना ठिकाना जहन्नम (नरक) में बनाले।’’
● हदीस-लेखन : हदीस-लेखन का, उपरोक्त संसाधन पर आधारित विशाल व महान कार्य, विधिवत रूप से यद्यपि, लगभग 200 वर्ष बाद आरंभ हुआ, फिर भी पैग़म्बरीय जीवन के 13 वर्षीय मक्का-काल के बाद, आप (सल्ल॰) के मदीना प्रस्थान (हिजरत) के 10 वर्षीय काल में, आप (सल्ल॰) के आदेश व अनुमति से तथा इस सावधानी के साथ कि आप (सल्ल॰) का कथन, क़ुरआन की आयतों से, स्पष्ट व निश्चित रूप से अलग रहना चाहिए और किसी भी बात के ‘ईशवाणी’ या ‘ईशदूतवाणी’ होने में किसी भ्रम, दुविधा, ग़लतफ़हमी की तनिक भी संभावना, गुंजाइश न रहे; कुछ हदीसें लिखी भी गईं। वैसे भी, क़ुरआन की भाषा-शैली और हदीस की भाषा-शैली में स्पष्ट अन्तर भी आसानी से विदित हो जाता है।
इसके अलावा, स्वयं पैग़म्बर (सल्ल॰) ने, कुछ विशेष अवसरों पर कुछ आवश्यक बातें लिखवाई थीं, जो आगे चलकर हदीसों का भाग बनीं। आप ने अपने जीवन के अन्तिम चरण में, इस्लामी शासन के कार्यकर्ताओं के पास भेजने के लिए ‘किताबुस्सदक़ा’ लिखवाई थी। इसमें ‘मवेशियों की ज़कात’ से संबंधित आदेश थे। इसी तरह आप (सल्ल॰) ने इस्लामी प्रशासन के अधिकारियों, कार्यकर्ताओं को फ़ौजदारी व दीवानी के क़ानून और मीरास (Inheritance) व ज़कात के आदेश भी, लिखवा कर विभिन्न इलाक़ों में भिजवाए। इसके अलावा आपके लिखवाए हुए पत्र, सन्धि-पत्र, जागीरों के अधिकार-पत्र आदि विभिन्न क़ौमों, क़बीलों के सरदारों के पास भेजे गये। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आप (सल्ल॰) ने कई देशों के शासकों को सत्य-धर्म स्वीकार करने का आह्नान देते हुए, एक पैग़म्बर और (इस्लामी राज्य के) शासक की हैसियत से पत्रा भेजे। ऐसे सभी पत्रों पर आप (सल्ल॰) की सरकारी मुहर लगी होती थी। ऐसे पत्रों की संख्या रिकार्ड पर है, इन में से कुछ की फोटो-प्रतिलिपियाँ भी मौजूद हैं। ये सब लिपिबद्ध हदीस का हिस्सा हैं।
● हदीस-संग्रह : हदीस के निम्नलिखित छः विश्वसनीय संग्रह हैं जिनमें 29,578 हदीसें संग्रहित हैं :
1. सहीह बुख़ारी :  संग्रहकर्ता—अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद-बिन-इस्माईल बुख़ारी, हदीसों की संख्या—7225
2. सहीह मुस्लिम : संग्रहकर्ता—अबुल-हुसैन मुस्लिम-बिन-अल-हज्जाज, हदीसों की संख्या—4000
3. सुनन तिर्मिज़ी : संग्रहकर्ता—अबू-ईसा मुहम्मद-बिन-ईसा तिर्मिज़ी, हदीसों की संख्या—3891
4. सुनन अबू-दाऊद : संग्रहकर्ता—अबू-दाऊद सुलैमान-बिन-अशअ़स सजिस्तानी, हदीसों की संख्या—4800
5. सुनन इब्ने माजह : संग्रहकर्ता—मुहम्मद-बिन-यज़ीद-बिन-माजह, हदीसों की संख्या—4000
6. सुनन नसाई : संग्रहकर्ता—अबू-अब्दुर्रहमान-बिन-शुऐब ख़ुरासानी, हदीसों की संख्या—5662
● उपरोक्त संग्रहों से संकलित अन्य प्रमुख उपसंग्रह :
1. मिश्कात : संग्रहकर्ता—मुहम्मद-बिन-अब्दुल्लाह अल-ख़तीब तबरेज़ी, हदीसों की संख्या—1894
2. रियाज़-उस्-सालिहीन: संग्रहकर्ता—अबू-ज़करीया-बिन-शरफ़ुद्दीन नबवी, हदीसों की संख्या—6294
● हदीस की, धर्मशास्त्र (शरीअत) में भूमिका: इस्लामी धर्मशास्त्र ‘क़ुरआन’ और ‘हदीस’ पर आधारित है। कुछ आधारभूत नियम क़ुरआन की आयतों से बने हैं। जिन नियमों की व्याख्या की आवश्यकता हुई, वह व्याख्या हदीस से ली गई है। बदलते हुए ज़मानों और नई-नई परिस्थितियों में जो नए-नए इशूज़ नई-नई समस्याएं सामने आती है उनसे संबंधित, शरीअत के क़ानून सिर्फ़ क़ुरआन और हदीस के अनुसार ही बनाए जाते हैं। यही कारण है कि किसी इन्सान को, चाहे वह मुसलमान ही हो और सारे मुसलमान मिल जाएँ, किसी को भी क़ुरआन और हदीस से निस्पृह व स्वच्छंद होकर शरीअत का कोई क़ानून बनाने का अधिकार प्राप्त नहीं है। क़ानून में संशोधन-परिवर्तन, जो क़ुरआन, हदीस की परिधि से बाहर जाकर किया जाए, असंभव और अमान्य होता है।
● हदीस साहित्य: हदीसों के संग्रह सामान्यतया विषयों के आधार पर अध्यायीकरण करके संकलित किए गए हैं, ये विषय जीवन के हर पहलू, हर क्षेत्र पर आधारित हैं। इन संग्रहों के बाद बहुत ही बड़े पैमाने पर इन (में उल्लिखित) हदीसों की व्याख्या पर व्यापक साहित्य तैयार किया गया है। फिर, विभिन्न विषयों को समाहित करने वाली पुस्तकें तैयार की गई है। इस प्रकार एक विशाल हदीस-साहित्य तैयार हो चुका है। ये संग्रह व साहित्य इस्लामी विद्यालयों के पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंश होते हैं। गोष्ठियों, बैठकों, सभाओं में पूरे विश्व में हदीस पाठ (दर्स-ए-हदीस) के प्रयोजन किए जाते हैं। इस तरह हदीस का ज्ञान और उसकी शिक्षाएँ मुस्लिम समाज में निरन्तर प्रवाहित होती रहती हैं।

●●

वार्न डूर्न

क्या ये संभव है कि जीवन भर आप जिस विचारधारा का विरोध करते आए हों एक मोड़ पर आकर आप उसके अनुनायी बन जाएं??

कुछ ऐसा ही हुआ है नीदरलैंड में.

लंबे समय तक इस्लाम की आलोचना करने वाले डच राजनेता अनार्ड वॉन डूर्न ने अब इस्लाम धर्म कबूल लिया है.

अनार्ड वॉन डूर्न नीदरलैंड की घोर दक्षिणपंथी पार्टी पीवीवी यानि फ्रीडम पार्टी के महत्वपूर्ण सदस्य रह चुके हैं. यह वही पार्टी है जो अपने इस्लाम विरोधी सोच और इसके कुख्यात नेता गिर्टी वाइल्डर्स के लिए जानी जाती रही है.

मगर वो पांच साल पहले की बात थी. इसी साल यानी कि 2013 के मार्च में क्लिक करें अर्नाड डूर्न ने इस्लाम धर्म क़बूल करने की घोषणा की.

नीदरलैंड के सांसद गिर्टी वाइल्डर्स ने 2008 में एक इस्लाम विरोधी फ़िल्म 'फ़ितना' बनाई थी. इसके विरोध में पूरे विश्व में तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं थीं.

"मैं पश्चिमी यूरोप और नीदरलैंड के और लोगों की तरह ही इस्लाम विरोधी सोच रखता था. जैसे कि मैं ये सोचता था कि इस्लाम बेहद असहिष्णु है, महिलाओं के साथ ज्यादती करता है, आतंकवाद को बढ़ावा देता है. पूरी दुनिया में इस्लाम के ख़िलाफ़ इस तरह के पूर्वाग्रह प्रचलित हैं."

अनार्ड डूर्न जब पीवीवी में शामिल हुए तब पीवीवी एकदम नई पार्टी थी. मुख्यधारा से अलग-थलग थी. इसे खड़ा करना एक चुनौती थी. इस दल की अपार संभावनाओं को देखते हुए अनार्ड ने इसमें शामिल होने का फ़ैसला लिया.

पहले इस्लाम विरोधी थे-
अनार्ड, पार्टी के मुसलमानों से जुड़े विवादास्पद विचारों के बारे में जाने जाते थे. तब वे भी इस्लाम विरोधी थे.

वे कहते हैं, "उस समय पश्चिमी यूरोप और नीदरलैंड के बहुत सारे लोगों की तरह ही मेरी सोच भी इस्लाम विरोधी थी. जैसे कि मैं ये सोचता था कि इस्लाम बेहद असहिष्णु है, महिलाओं के साथ ज्यादती करता है, आतंकवाद को बढ़ावा देता है. पूरी दुनिया में इस्लाम के ख़िलाफ़ इस तरह के पूर्वाग्रह प्रचलित हैं."

साल 2008 में जो इस्लाम विरोधी फ़िल्म 'फ़ितना' बनी थी तब अनार्ड ने उसके प्रचार प्रसार में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था. इस फ़िल्म से मुसलमानों की भावनाओं को काफ़ी ठेस पहुंची थी.

वे बताते हैं, "'फ़ितना' पीवीवी ने बनाई थी. मैं तब पीवीवी का सदस्य था. मगर मैं 'फ़ितना' के निर्माण में कहीं से शामिल नहीं था. हां, इसके वितरण और प्रोमोशन की हिस्सा ज़रूर था."

अनार्ड को कहीं से भी इस बात का अंदेशा नहीं हुआ कि ये फ़िल्म लोगों में किसी तरह की नाराज़गी, आक्रोश या तकलीफ़ पैदा करने वाली है.

वे आगे कहते हैं, "अब महसूस होता है कि अनुभव और जानकारी की कमी के कारण मेरे विचार ऐसे थे. आज इसके लिए मैं वाक़ई शर्मिंदा हूं."

सोच कैसे बदली?

अनार्ड ने बताया, "जब फ़िल्म क्लिक करें बाज़ार में आई तो इसके ख़िलाफ़ बेहद नकारात्मक प्रतिक्रिया हुई. आज मुझे बेहद अफ़सोस हो रहा है कि मैं उस फ़िल्म की मार्केटिंग में शामिल था."

इस्लाम के बारे में अनार्ड के विचार आख़िर कैसे बदलने शुरू हुए?

वे बताते हैं, "ये सब बेहद आहिस्ता-आहिस्ता हुआ. पीवीवी यानि फ़्रीडम पार्टी में रहते हुए आख़िरी कुछ महीनों में मेरे भीतर कुछ शंकाएं उभरने लगी थीं. पीवीवी के विचार इस्लाम के बारे में काफ़ी कट्टर थें, जो भी बातें वे कहते थे वे क़ुरान या किसी किताब से ली गई होती थीं."

इसके बाद दो साल पहले अनार्ड ने पार्टी में अपनी इन आशंकाओं पर सबसे बात भी करनी चाही. पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

तब उन्होंने क़ुरान पढ़ना शुरू किया. यही नहीं, मुसलमानों की परंपरा और संस्कृति के बारे में भी जानकारियां जुटाने लगें.

मस्जिद पहुंचे

अनार्ड वॉन डूर्न इस्लाम विरोध से इस्लाम क़बूल करने तक के सफ़र के बारे में कहते हैं, "मैं अपने एक सहयोगी से इस्लाम और क़ुरान के बारे में हमेशा पूछा करता था. वे बहुत कुछ जानते थे, मगर सब कुछ नहीं. इसलिए उन्होंने मुझे मस्जिद जाकर ईमाम से बात करने की सलाह दी."

उन्होंने बताया, "पीवीवी पार्टी की पृष्ठभूमि से होने के कारण मैं वहां जाने से डर रहा था. फिर भी गया. हम वहां आधा घंटे के लिए गए थे, मगर चार-पांच घंटे बात करते रहे."

अनार्ड ने इस्लाम के बारे में अपने ज़ेहन में जो तस्वीर खींच रखी थी, मस्जिद जाने और वहां इमाम से बात करने के बाद उन्हें जो पता चला वो उस तस्वीर से अलहदा था.

वे जब ईमाम से मिले तो उनके दोस्ताने रवैये से बेहद चकित रह गए. उनका व्यवहार खुला था. यह उनके लिए बेहद अहम पड़ाव साबित हुआ. इस मुलाक़ात ने उन्हें इस्लाम को और जानने के लिए प्रोत्साहित किया.

वॉन डूर्न के मस्जिद जाने और इस्लाम के बारे में जानने की बात फ़्रीडम पार्टी के उनके सहयोगियों को पसंद नहीं आई. वे चाहते थे कि वे वही सोचें और जानें जो पार्टी सोचती और बताती है.

अंततः इस्लाम क़बूल लिया

मगर इस्लाम के बारे में जानना एक बात है और इस्लाम धर्म क़बूल कर लेना दूसरी बात.

पहले पहले अर्नाड के दिमाग़ में इस्लाम धर्म क़बूल करने की बात नहीं थी. उनका बस एक ही उद्देश्य था, इस्लाम के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना. साथ ही वे ये भी जानना चाहते थे कि जिन पूर्वाग्रहों के बारे में लोग बात करते हैं, वह सही है या यूं ही उड़ाई हुई.

इन सबमें उन्हें साल-डेढ़ साल लग गए. अंत में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस्लाम की जड़ें दोस्ताना और सूझ बूझ से भरी हैं.

इस्लाम के बारे में ख़ूब पढने, बातें करने और जानकारियां मिलने के बाद अंततः उन्होंने अपना धर्म बदल लिया.

अनार्ड के इस्लाम क़बूलने के बाद बेहद मुश्किलों से गुज़रना पड़ा. वे कहते हैं, "मुझपर फ़ैसला बदलने के लिए काफ़ी दबाव डाले गए. अब मुझे ये समझ में आ रहा था कि मेरे देश नीदरलैंड में लोगों के विचार और सूचनाएं कितनी ग़लत हैं."

परिवार और दोस्तों को झटका

परिवार वाले और दोस्त मेरे फ़ैसले से अचंभित रह गए. मेरे इस सफ़र के बारे में केवल मां और गर्लफ्रेंड को पता था. दूसरों को इसकी कोई जानकारी नहीं थे. इसलिए उन्हें अनार्ड के मुसलमान बन जाने से झटका लगा.

कुछ लोगों को ये पब्लिसिटी स्टंट लगा, तो कुछ को मज़ाक़. अनार्ड कहते हैं कि अगर ये पब्लिसिटी स्टंट होता तो दो-तीन महीने में ख़त्म हो गया होता.

वे कहते हैं, "मैं बेहद धनी और भौतिकवादी सोच वाले परिवार से हूं. मुझे हमेशा अपने भीतर एक ख़ालीपन महसूस होता था. मुस्लिम युवक के रूप में अब मैं ख़ुद को एक संपूर्ण इंसान महसूस करने लगा हूं. वो ख़ालीपन भर गया है." (बीबीसी से बातचीत पर आधारित)

http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/11/131111_dutch_politician_islam_sk.shtml

#Admin001[Ali]