Wednesday, June 2, 2021

धन्यवाद केन्या

#केन्या द्वारा भेजे गए 12 टन अनाज पर सोशल मीडिया में केन्या को "भिखारी, भिखमंगा, गरीब" आदि आदि कहा जा रहा है।

आपने अमरीका का नाम सुना होगा, मैनहैटन का भी, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का भी और ओसामा बिन लादेन का भी। जो ज़्यादातर लोगों ने नहीं सुना होगा वो है 

इनोसाईन गाँव' जो पड़ता है केन्या और तंजानिया के बॉर्डर पर और यहाँ की लोकल जनजाति है #मसाई ।

अमेरिका पर हुए 9/11 के हमले की ख़बर मसाई लोगों तक पहुचने में कई महीने लग गए। ये ख़बर उन तक तब पहुँची जब उनके गाँव के पास के ही कस्बे में रहने वाली, स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी की मेडिकल स्टूडेंट किमेली नाओमा छुट्टियों में वापस केन्या आयी और वहाँ की लोकल जनजाति मसाई को 9/11 का आंखों देखा हाल सुनाया। 

कोई बिल्डिंग इतनी ऊंची हो सकती है कि वहाँ से गिरने पर जान चली जाए, झोपड़ी में रहने वाले मसाई लोगों के लिए ये बात अविश्वसनीय थी मगर फिर भी उन लोगों ने अमरीकियों के दुःख को महसूस किया और उसी मेडिकल स्टूडेंट के माध्यम से केन्या की राजधानी नैरोबी में अमेरिकी दूतावास के डिप्टी चीफ़ विलियम ब्रांगिक को एक पत्र भिजवाया जिसे पढ़ने के बाद विलियम ब्रांगिक ने पहले हवाई जहाज का सफर किया, उसके बाद कई मील तक टूटी फूटी सड़क पर कठिनाई का रास्ता पर करते हुए मसाई जनजाति के गाँव पहुँचे।

गाँव पहुँचने पर मसाई जनजाति के लोग इक्कट्ठा हुए और एक कतार में 14 गायें ले कर अमरीकी दूतावास के डिप्टी चीफ़ के पास पहुँचे। मसाईयों के एक बुज़ुर्ग ने गायों से बंधी रस्सी डिप्टी चीफ़ के हांथों पे पकड़ाते हुए एक तख़्ती की तरफ इशारा कर दिया। जानते हैं उस तख़्ती पर क्या लिखा था? लिखा था- "इस दुःख की घड़ी में अमरीका के लोगों की मदद के लिए हम ये गायें उन्हें दान कर रहे हैं"। जी हाँ, उस पत्र को पढ़ कर दुनियाँ के सबसे ताकतवर और समृद्धि देश का राजदूत सैकड़ो मील चल कर चौदह गायों का दान लेने आया था। 

गायों के ट्रांसपोर्ट की कठिनाई और कानूनी बाध्यता के कारण गायें तो नहीं जा पायीं मगर उनको बेंचकर एक मसाई आभूषण ख़रीद कर 9/11 मेमोरियल म्यूजियम में रखने की पेशकश की गई। जब ये बात अमरीका के आम नागरिकों तक पहुँची तो पता है क्या हुआ? उन्होंने आभूषण की जगह गाय लेने की ज़िद्द कर दी। ऑनलाइन पिटीशन साइन किये गए की उन्हें आभूषण नहीं गाय ही चाहिए, अधिकारियों को ईमेल लिखे गए, नेताओं से बात की गई और करोड़ों अमरीका वासियों ने मसाई जनजाति और केन्या के लोगों को इस अभूतपूर्व प्रेम के लिए कृतज्ञ भाव से धन्यवाद दिया, उनका अभिनंदन किया।

12 टन अनाज को सहर्ष स्वीकार करिये।( और निक्कमे को कोसिए की वो ये नौबत ला चुका है।) दान नहीं, दानी का हृदय देखिये, कंकड़ नहीं, कंकड़ उठा कर सेतु में लगाने वाली गिलहरी की श्रद्धा देखिये। 

~~~ समर प्रताप की वॉल से

Monday, May 31, 2021

बेगुनाह क़ैदी

*अगर मैं मुस्लमान ना होता...*


******************

*#बेगुनाह_कैदी*
******************

अगर मैं मुसलमान न होता तो शायद चुन-चुन कर उन लोगों को मार देता जिन्होंनें मुझपर झूठे आरोप लगाकर मुझे फंसाया.

 चूंकि इस्लाम अमन पसंद मज़हब है इसलिए मैंने हथियार की जगह कलम उठाई. मैंने किताब लिखी. अपने साथ हुए जुल्म को लफ्जों के ज़रिये किताब में दर्ज किया. जेल में 9 साल तक रहा. 


शुरूआत में मेरी किताब के पन्ने फाड़ दिए जाते थे.जला दिए जाते थे लेकिन आखिरकार मैं इसे लिखने में कामयाब हो गया. 

मुंबई ट्रेन ब्लास्ट (वर्ष-2006) में रिहा हुए आरोपी अब्दुल वाहिद शेख का कहना है यह. 29 सितंबर वर्ष 2006 को वाहिद को गिरफ्तार किया गया और 26 नवंबर 2015 को वह रिहा हुए. उन्हें ATS ने उठाया और फिर पुलिस कस्ट्डी  में कभी  न खत्म होने वाला अत्याचारों का सिलसिला शुरू हुआ.


पुलिस रिमांड में पहले-दूसरे और तीसरे दर्जेके टॉरचर से आज तक वाहिद के पांव उबर नहीं सके.उनकी पांव की एड़ियों में दिक्कत आ चुकी है। सेब संबंधी ढेरों समस्याओं से जूझ रहे हैं. 


वह बताते हैं कि कैसे उनकी शर्मगाह में पेट्रोल डाला जाता था, नंगी तारों से करंट लगाया जाता है, फुल ऐसी चलाकर बिल्कुल नंगा खड़ा कर दिया जाता है.कई दिनों के लिए आंखों पर पट्टी बांधकर एक अंधेरे कमरे में छोड़ दिया जाता है, पांव पर लाठियां मारी जातीं, हाथों पर पटा मारा जाता, फिर फौरन दो लोग ज़बरदस्ती सहारा देकर चलाते.  उनका कहना है कि पुलिस का एक ही मकसद होता है कि किसी प्रकार आरोपी स्वीकारनामे पर हस्ताक्षर कर दे।

 इसके लिए आरोपी के परिवार को बुलाकर भी बेईज्जत किया जाता है.जब टॉरचर में बारी परिवार की आती है तो इंसान हार मान लेता है. वो सोचता है कि बस परिवार को छोड़ दो, आप जो आरोप लगा रहे हैं सब अपराध मैंने किए हैं। रिश्तेदारों को डराया-धमकाया जाता है कि वे इनके खिलाफ गवाही दें.

वाहिद के जिस रिश्तेदार को इस गवाही पर राज़ी किया गया था कि ट्रेन ब्लास्ट के बाद कुछ पाकिस्तानी वाहिद के एक फ्लैट पर आकर रुके थे लेकिन वह रिश्तेदार पुलिस के सामने तो मान गया लेकिन अदालत में उसने वाहिद के खिलाफ इस तरह की झूठी गवाही नहीं दी.

इस दौरान वाहिद की पत्नी साजिदा ने घर संभाला.उन्होंने एक प्राइवेट स्कूल में टीचर की नौकरी की. अदालत में धक्के खाए, वकीलों के पास जाती रहीं। 

बच्च् संभाले। वाहिद बताते हैं किइस 9 साल की तपस्या और मुझे छुड़वाने की भागदौड़ में आज वो बहुत बीमार हो चुकी है.


वाहिद जांच एसेंसियों पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि वे हमारे घरों से बच्चों की उर्दू की किताबें उठाकर ले गए, आउटलुक और इंडिया टुडे जैसी मैग्ज़ीन उठाकर ले गए जिनपर ओसामा बिन लादेन की तस्वीरें छपी थीं.बरहाल 9 साल बाद वाहीद जेल से छूटे और उन गवाहों से भी मिले और ATS के लोगों से भी मुलाकात कर पूछा कि उनके साथ ऐसा क्यों किया गया? इन सवालों का एक ही जवाब था कि ऊपर से आदेश था। 

वाहिद ने कहा कि जो मेरे साथ हुआ उसके नतीजे में तो मुझे बंदूक उठा लेने चाहिए लेकिन मैं मुसलमान हुआ मुझे इस्लाम अमन की तालीम देता है इसलिए मैंने क़लम उठाई और पूरी दास्तां लोगों के सामने रख दी।


Sunday, May 16, 2021

करोना महामारी

माननीय उच्च न्यायालय के शब्दों में उप्र0 में ठीक महामारी के बीच चुनाव कराकर, टेस्ट-दवा-इलाज-टीका के अभाव में, यह जो नरसंहार हो रहा है, समाज उसे सदियों भूल नहीं पायेगा, जनता उसे हमेशा याद रखेगी और समय आने पर उसका हिसाब चुकता करेगी !

सबसे बर्बर, झूठा और नाकारा है कोरोना से निपटने का योगी मॉडल !

ग्रामीण भारत में कोविड से मची तबाही से सुलगते जन-आक्रोश को भांपते हुए मोदी जी ने 14 मई को किसान खातों में सम्मान -निधि की 2000 रू की  क़िस्त जारी की । असंख्य गांववासियों ने जो खोया है, क्या इससे उसकी भरपाई हो पाएगी ?

दरअसल महामारी की दूसरी लहर की शायद  सबसे बड़ी कहानी यही है कि अबकी बार यह भारत के गांवों में कहर बरपा कर रही है, मोदी-योगी राज में टेस्ट, दवा, अस्पताल, इलाज के अभाव में  इस विनाशलीला का कोई अंत नहीं दिख रहा।

उत्तर प्रदेश में तेजी से बिगड़ते हालात के बीच वाराणसी जो मोदीजी का संसदीय क्षेत्र भी है, वहां मोदी जी के चहेते पूर्व IAS अधिकारी अरविंद शर्मा (जो किसी बड़े पोलिटिकल assignment की अटकलों के बीच MLC बनाये गए थे ) को लगाया गया है। पर हालत यह है कि वहां मोदी जी के 2014 चुनाव के प्रस्तावक, प्रख्यात शास्त्रीय संगीत गायक पद्म-विभूषण छन्नू मिश्र  की बेटी तक की उचित इलाज के अभाव में मौत हो गयी। उनकी दूसरी बेटी के मीडिया के सामने आने के बाद अब DM ने जांच बैठा दिया है। सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक, पद्मभूषण राजन मिश्र की वेंटिलेटर के अभाव में मौत हो गयी। अब उनके नाम पर बनारस में एक कोविड अस्पताल का नामकरण किया गया है। अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए उनके बेटे रजनीश ने कहा, " पिताजी अस्पताल देखने नहीं आएंगे, न रामजी अयोध्या में मंदिर देखने। प्रधानमंत्री का नया आवास बाद में भी बन सकता है, इस समय देश को सारी सुविधाओं से सुसज्जित अच्छे अस्पतालों की जरूरत है, ताकि लोगों की जान बचाई जा सके।" उनके चाहने वालों में गुस्सा है, " जरूरत पर सरकार उन्हें वेंटिलेटर नहीं दे सकी, अब नाम रखने से क्या फायदा ?"
अंतिम क्रिया के लिए शवों का जिस तरह अम्बार लगा हुआ है, मणिकर्णिका घाट श्मशान की तस्वीरें लोगों को डरा रही हैं।

राजधानी लखनऊ में लगातार मौतें जारी हैं, कोरोना की दूसरी लहर में यहां ऑक्सीजन, बेड, अस्पताल और दवाओं के अभाव में तबाही का मंजर दिल्ली और मुम्बई जैसे महानगरों जैसा है।

इलाहाबाद में स्थिति की भयावहता को बताने के लिए स्वरूपरानी अस्पताल में सही इलाज और वेंटिलेटर के अभाव में उसी अस्पताल में मशहूर सर्जन रहे डॉ0 जेके मिश्र की दुःखद मौत ही पर्याप्त है। 

उप्र की सच्चाई आज क्या है, यह बता रही हैं गाजीपुर , बलिया, उन्नाव में गंगा में बहती लाशें, नदी किनारे रातों रात उग आई बेशुमार कब्रें  ( दैनिक भास्कर की टीम ने गंगा किनारे ऐसी 2000 कब्रों की रिपोर्ट किया है ), बेहिसाब जलती चिताएं, पीपल के पेड़ों पर रोज लटकती नई मटकियों की बाढ़। 
बुखार, खांसी,  सांस की तकलीफ और पट-पट गिरती लाशें। मेरठ, मुजफ्फरनगर से लेकर गोरखपुर, कुशीनगर तक हाहाकार मचा हुआ है।
टेस्ट हो नहीं रहा तो ये अनगिनत मौतें कोविड में दर्ज नहीं हो रहीं। इसलिए आंकड़े बिल्कुल चाक चौबंद , अब घटते जा रहे!

लेकिन हालत की भयावहता को इससे समझा जा सकता है कि थोड़ा-बहुत जो टेस्ट हो रहा, उसमें Positivity दर अप्रैल के पहले सप्ताह के 2.69% की तुलना में बढ़कर मई के पहले हफ्ते में 20% हो गयी अर्थात हर 5 आदमी में 1 कोरोना पीड़ित। दरअसल, जिस तरह गांव-गांव, घर-घर लोगों में लक्षण है, शायद यह संख्या भी under-estimation है।

वैक्सीन का तो टोटा पड़ ही गया है, प्रशासनिक अराजकता और झूठ-फरेब का आलम यह है कि अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार इलाहाबाद में अनेक लोगों को बिना टीका लगे ही टीकाकरण का प्रमाणपत्र उनके पास पहुंच रहा है!

आज हालत कितनी बुरी है यह जानने के लिए  स्वयं संघ-भाजपा के अंदर से उठती  आवाजों को सुनना ही पर्याप्त है। केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह और संतोष गंगवार जो प्रदेश भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में हैं, प्रदेश सरकार के ताकतवर मंत्री ब्रजेश पाठक, अवध के भाजपा के बड़े पासी नेता सांसद कौशल किशोर और अनेक विधायक अपनी ही सरकार की नाकामी पर सवाल उठा चुके हैं। अमित जायसवाल जैसे संघ के कार्यकर्ता जिन्हें प्रधानमंत्री स्वयं फॉलो करते थे, वे मोदीजी, योगी जी को टैग करने के बावजूद इलाज के अभाव में विदा हो गए।

बुलंदशहर के बनेल गांव में संघ के सरसंघचालक रहे रज्जू भैया ( प्रो0 राजेन्द्र सिंह ) के जवान पोते की इलाज के अभाव में कोविड से मौत हो गई। NDTV के श्रीनिवासन जैन की वहां से जारी रिपोर्ट के अनुसार इस VIP गांव में अनेक लोग दम तोड़ चुके हैं, 10 हजार की आबादी में मात्र 79 लोगों की टेस्टिंग हुई जिसमें 19 पॉजिटिव निकले। न टेस्टिंग है, न डॉक्टर है, न अस्पताल में कोई इलाज है। यह VIP गांव की कहानी है जिसे बुलंदशहर के भाजपा सांसद गोद लिए हुए हैं। बहरहाल परम्परागतरूप से भाजपा समर्थक वहां के ग्रामवासियों में भाजपा और योगी सरकार के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश है, जिसकी अभिव्यक्ति पंचायत चुनाव में हुई जहाँ भाजपा का जिला पंचायत उम्मीदवार चौथे स्थान पर चला गया।

यह देखना रोचक है कि विदेशी मीडिया में हो रही थू-थू से घबड़ाई हुई  मोदी- योगी की परम् स्वदेशी/राष्ट्रवादी सरकारें विदेशी सर्टिफिकेट के लिए बेतरह बेचैन हैं, हालत यह है कि झूठ-फरेब के बल पर विदेशी अखबारों, संस्थाओं के तमगे का नैरेटिव गढ़ने के desperation में वे पूरी दुनिया में मजाक बन कर रह गए हैं। माहौल बनाया गया जैसे कि लंदन के अखबार Guardian में मोदी सरकार की तारीफ की गई हो, मोदी कैबिनेट के अनेक मंत्रियों ने उसे शेयर और रीट्वीट कर डाला, बाद में पता चला कि वह पाठकों को ठगने के लिए Guardian के बगल में Daily जोड़कर बनाई गई कोई लोकल वेबसाइट है उत्तर प्रदेश की!

इसी तरह योगी जी के नवरत्नों ने यह प्रचारित करवा दिया था कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय की किसी आर्टिकल में कोरोना से निपटने के योगी मॉडल की प्रशंसा की गई है। बाद में हार्वर्ड के प्रवक्ता को सार्वजनिक बयान देना पड़ा कि यह सफेद झूठ है!

अभी हाल-फिलहाल यह प्रचारित किया जा रहा है कि WHO ने योगी सरकार की तारीफ की है। लोग हैरान हैं कि जिस दिन गंगा में कोरोना मृतकों की लाशें तैरती मिल रही हैं, गांवों में चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है, उस समय इसका क्या मतलब है। बहरहाल, थोड़ा तह में जाइये तो पता लगता है कि यह उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता का बयान है कि WHO ने हमारी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की तारीफ की है, WHO का कहीं पब्लिक डोमेन में कोई बयान नहीं है। दैनिक भास्कर की विस्तृत पोलखोल के अनुसार जब WHO के कार्यालय से इसके बारे में जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया। सच्चाई यह है कि जब कम्युनिटी ट्रांसमिशन के हालात हैं, गांव का गांव, मुहल्ले का मुहल्ला बुखार में तप रहा है, तब कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पर पीठ थपथपाने का कितना औचित्य और उपयोगिता बची है, वह भी संदिग्ध आंकड़ों और मैनेजमेंट से !

आखिर इन तिकड़मों की क्या जरूरत है ?  क्या इन एजेंसियों के प्रमाणपत्र से आज प्रदेश का जो भयावह सच है, वह बदल जाएगा ? क्या इनसे जिन लोगों ने अपनों को खोया है, वे अपना दर्द भूल जाएंगे ?

माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपनी चर्चित टिप्पणी में कहा है कि उत्तर प्रदेश में जो हो रहा है यह जनसंहार से कम नहीँ हैं ! उसने पंचायत चुनाव की ड्यूटी पर लगाये गए 2 हजार से ऊपर शिक्षकों, कर्मचारियों तथा अनगिनत आम जनता की मौत के लिए चुनाव आयोग और उत्तरप्रदेश सरकार को जिम्मेदार माना है।

वे परिवार, वे गांव जिन्होंने अपनों को खोया है, वे पूछ रहे हैं कि ये चुनाव स्थिति सामान्य होने पर होते तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता ? कौन सा संवैधानिक संकट खड़ा हो जाता ? संविधान, लोकतंत्र की रक्षा की मोदी- योगी को कितनी परवाह है, यह देश-दुनिया में किससे छिपा है !

दरअसल, बंगाल विजय की जो बेचैनी मोदी-शाह को थी, वही पंचायत-विजय की योगी जी को थी। शायद उनके कुनबे को यह आशंका थी कि अभी चुनाव टला तो विधानसभा चुनाव के पूर्व नहीं हो पायेगा, इसलिए अपनी सरकार के रहते, मशीनरी की मदद से वे सत्ता और धन के स्रोत पंचायत के विभिन्न स्तरों पर अपना कब्जा सुनिश्चित करने को व्यग्र थे। हालांकि, उप्र0 की जनता ने योगी और उनके सिपहसालारों के मंसूबों को ध्वस्त कर दिया।

सच्चाई यह है कि योगी जी हर मर्ज की केवल एक दवा  जानते हैं -ठोंक दो।

आज उप्र0 में लोगों को सबसे ज्यादा दुःख और नाराजगी इस बात को लेकर है कि मुख्यमंत्री लगातार झूठे दावे कर रहे हैं और अहंकारपूर्ण मुद्रा अख्तियार किये हुए हैं । जो लोग आईना दिखा रहे हैं और संकट की घड़ी में लोगों की मदद कर रहे हैं, उन्हें ही कठघरे में खड़ा करने और धौंस धमकी देने में लगे हैं। योगी ने एलान कर दिया कि प्रदेश में किसी अस्पताल में ऑक्सीजन, बेड, डॉक्टर की कोई कमी नहीं है और जो भी इसकी शिकायत कर रहा है, वह माहौल खराब कर रहा है, उसके ऊपर NSA लगाया जाएगा और उसकी सम्पत्ति जब्त होगी।

ऐसे संवेदनहीन बयानों पर कड़ी फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, "सोशल मीडिया पर जो लोग अपनी परेशानियां जता रहे हैं, उनके साथ बुरा बर्ताव नहीं होना चाहिए.  यहां से यह कड़ा संदेश जाना चाहिए कि अगर किसी नागरिक पर मदद की गुहार लगाने के लिए एक्शन लिया गया, तो उसे कोर्ट की अवमानना माना जाएगा."  

सरकार की सारी कोशिश सच्चाई को छिपाने की, आंकड़ों को दबाने की और झूठे प्रचार से बस यह नैरेटिव स्थापित करने की है कि सरकार बहुत तत्परता से सारी चीज़ों को ठीक कर रही है और  किसी चीज की न कोई कमी है न किसी तरह की  कोई समस्या है। जो किसी भी तरह की शिकायत या आलोचना कर रहे हैं, उनका मुंह बंद करने को सरकार तत्पर है।

गौर से देखा जाय तो यह संघ-भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा लॉन्च किए गए " पॉजिटिविटी अनलिमिटेड " अभियान का ही योगी संस्करण है। संघ के दूसरे सबसे ताकतवर नेता सर कार्यवाह ( महासचिव ) दत्तात्रेय हसबोले ने कहा कि, " विध्वंसक और भारत-विरोधी ताकतें समाज में इन परिस्थितियों से फायदा उठाकर नेगेटिविटी और अविश्वास ( mistrust ) पैदा कर सकती हैं।" जाहिर है, महामारी से निपटने की सरकार की नीतियों, तौर-तरीकों और कदमों से जो लोग असहमत हैं, उसकी आलोचना करते हैं, उसमें बदलाव की मांग करते हैं, उसके लिए सुझाव देते हैं, ऐसे लोगों को निगेटिविटी फैलाने वाला, विध्वंसक और भारत-विरोधी करार दिया जा सकता है और उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है! 

स्वास्थ्यमंत्री हर्षवर्धन द्वारा चॉकलेट का सुझाव, कोरोनिल का प्रचार, गुजरात मे गोबर लेपन, गोमूत्र,  हवन-मंत्र , गाँवों में महिलाओं द्वारा कोरोना माई के शमन के लिए सामूहिक तौर पर जल चढ़ाना आदि इसी पॉजिटिविटी कैम्पेन का हिस्सा लगता है।

बहरहाल महामारी से लड़ने के लिए  सबसे जरूरी है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाय, बीमारी की सच्चाई को स्वीकार किया जाय, सही तथ्यों और आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर ही उससे निपटने की सही नीति स्वास्थ्य विशेषज्ञ निकाल सकते हैं, जिसे उनके मार्गदर्शन में कुशलता, ईमानदारी और संवेदनशीलता से लागू करके ही सरकार महामारी से सफलतापूर्वक लड़ सकती है।

पर यहां तो ऊपर से लेकर नीचे तक पूरी दिशा ही उल्टी है। जनता की प्राणरक्षा नहीं, अपनी छवि-रक्षा (Image building ) एजेंडा है। कल तक उनके परम् भक्त रहे अनुपम खेर को भी कहना पड़ा, " छवि बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है जान बचाना। " 

The Australian ने मोदी और केंद्र सरकार के बारे में लिखा, " अहंकार, अतिराष्ट्रवाद और नौकरशाही अक्षमता ने मिलकर भारत में इस विराट आपदा को जन्म दिया है ।" यह बात योगी ( जिन्हें अनेक हिंदुत्व समर्थक मोदी जी का उत्तराधिकारी मानते हैं ) के उप्र मॉडल पर भी समान रूप से लागू होती है।

बहरहाल, महामारी नियंत्रण की नाकामी ने राजनीतिक कीमत वसूलना शुरू कर दिया है। किसान आंदोलन और कोविड की तबाही ने मिलकर उप्र0 पंचायत चुनावों में भाजपा को 2019 की प्रचण्ड जीत और 2017 विधानसभा की 70% सीटों के भारी बहुमत से जिला-पंचायत की 30% सीटों पर पहुंचा दिया है, दूसरे स्थान पर। उल्लेखनीय है कि मोदी जी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी, योगी जी के गृहक्षेत्र गोरखपुर, धर्मनगरी अयोध्या, मथुरा, प्रयागराज में भी भाजपा की करारी हार हुई है। प0 बंगाल चुनाव परिणाम से उत्साहित किसान नेताओं ने भी हुंकार भरी है कि बंगाल के बाद उप्र0 अब उनका अगला निशाना है।

माननीय उच्च न्यायालय के शब्दों में यह जो उप्र0 में नरसंहार हो रहा है, जनता उसे याद रखेगी और समय आने पर उसका हिसाब चुकता करेगी ।

( पढ़िए न्यूज़क्लिक हिंदी- Newsclick Hindi पोर्टल पर मेरा लेख, लिंक कमेंट बॉक्स में )

Sunday, May 9, 2021

भाजपा एक श्राप

*कांगो और रवांडा जैसे देश हमारी जान बचाने के लिए मदद भेज रहे हैं और हमारे प्रधानमंत्री अपने लिए 20 हजार करोड़ का हवा महल बनवा रहे हैं.* 

*इस सरकार ने देश को पाकिस्तान, कांगो और  रवांडा से भी पीछे धकेल दिया है. भारत की ऐसी छवि तो तब भी नहीं बनी थी जब हम तीसरी दुनिया के गरीब देशों में गिने जाते थे.*

*शिवसेना ने एकदम सही कहा है कि “देश अभी नेहरू-गांधी के बनाए सिस्टम की वजह से सर्वाइव कर रहा है. कई गरीब देश भारत की मदद कर रहे हैं. पहले पाकिस्तान, रवांडा और कॉन्गो दूसरों से मदद लेते थे. लेकिन भारत के मौजूदा शासकों की गलत नीतियों की वजह से देश इस स्थिति से गुजर रहा है. छोटे पड़ोसी देश महामारी से निपटने में भारत को मदद दे रहे हैं, वहीं मोदी सरकार दिल्ली में कई करोड़ के सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का काम रोकने के लिए तैयार नहीं है. नेपाल, म्यांमार और श्रीलंका जैसे देश आत्मनिर्भर भारत को मदद की पेशकश कर रहे हैं.”*

*इंटरनेशनल मेडिकल जर्नल द लैंसेट ने लिखा है कि मोदी सरकार को अपनी गलतियां स्वीकार करते हुए जिम्मेदार नेतृत्व प्रदान करना चाहिए. खतरे के बारे में आगाह करने पर सुपरस्प्रेडर एवेंट हुए. अब जब तबाही मची है तो मोदी सरकार इसे रोकने के प्रयास करने की जगह फेसबुक और ट्विटर पर अपनी आलोचना करने वालों पर शिकंजा कसने में जुटी है.*  

*दुनिया के सभी बड़े मीडिया संस्थान कोरोना की दूसरी लहर में मची तबाही के लिए भारत में 'अक्षम सरकार' और लुंजपुंज नेतृत्व को जिम्मेदार मान रहे हैं जिसने महामारी के समय चुनावी रैलियां कीं, कुंभ आयोजित किया और लोगों के बेपरवाह होने में अहम भूमिका निभाई. जब देश को कोरोना से निपटने की तैयारी करनी थी, तब भारत के प्रधानमंत्री मोदी झूठ का कारोबार करने में व्यस्त थे. अब जब मामला हाथ से निकल गया है तो मोदी सरकार अपनी छवि चमकाने में व्यस्त है.* 

*इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) स्वास्थ्य मंत्रालय से गुजारिश कर रहा है कि 'सरकार अब तो जाग जाओ'. एसोसिएशन कोरोना संकट पर केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कह रहा है कि वह स्वास्थ्य मंत्रालय की 'सुस्ती' देखकर हैरान है.*

*IMA ने कहा है, “महामारी की दूसरी वेव की वजह से पैदा हुए संकट से निपटने में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की सुस्ती और अनुचित कार्रवाई देखकर हम हैरान हैं...सामूहिक चेतना, सक्रिय संज्ञान और IMA समेत दूसरे समझदार साथियों के निवेदन को कूड़ेदान में डालकर और बिना जमीनी हालात समझे फैसले लिए जाते हैं.”*

*एसोसिएशन का कहना है कि “मोदी सरकार झूठ बोलना बंद करे. आंकड़ों में पारदर्शिता लाए. कोविड मौतों को गैर-कोविड मौतें बताना बंद करे. देश में ऑक्सीजन का प्रोडक्शन पर्याप्त है, लेकिन दिक्कत उसके डिस्ट्रीब्यूशन में है.”* 

*झूठ के रेत के सहारे नए भारत बनाने की प्रचार-पिपासा ने देश को ऐसे संकट में धकेल दिया है जहां कितने लाख मारे जाएंगे, किसी को अंदाजा तक नहीं है...

Friday, April 2, 2021

वो मूर्ख नहीं है , मूर्ख आप है ।

वो मूर्ख नहीं है , मूर्ख आप है । 

आपने अर्थशास्त्री को हटाकर सोचा था कि एक ऐसा व्यक्ति देश की अर्थव्यवस्था सुधार देगा जिसकी डिग्री तक संदिग्ध है । 

वो तो खुद कह रहा था कि मैंने चाय बेची है , आप भावना में बह गए । चाय बेचने वाले से आपको सहानुभूति हो सकती है , आप उससे प्रेम भी कर सकते हैं लेकिन अपनी बैलेन्सशीट नहीं बनवा सकते । आपने देश की बैलेन्सशीट उनके हाथ में सोंप दी , तो मूर्ख कौन है ?? 

उसने पहले ही बता दिया था कि उसने घर छोड़ा था , बीवी छोड़ी थी , मतलब वो ज़िम्मेदारी से भागता है लेकिन आपने इसे भी देश भक्ति से जोड़कर देश की ज़िम्मेदारी उसे सोंप दी , तो मूर्ख कौन है ?? 

उसकी इतिहास की जानकारी गड़बड़ है , उसकी भूगोल की जानकारी गड़बड़ है , यह आपको पहले से पता था लेकिन आपने देश का वर्तमान उसके हाथ में सोंप दिया तो मूर्ख कौन है ?? 

वो नाले की गैस से चाय बनवाता है , वो बादल में फ़ाइटर जेट छिपाकर रडार से बच जाता है , वो विंड टर्बाईन से ऑक्सिजन अलग करवाता है और आप ताली बजाते हैं तो मूर्ख कौन है ?? 

मूर्ख आप हो , मूर्ख वो नहीं है । उन्हें मूर्ख बोलकर अपनी खीज मत उतारिए ।

Wednesday, September 2, 2020

परवाज़ भाग १

परवाज़ भाग १

                  वह अपना कैरियर बनाना चाहती थी लेकिन उसका पति पुराने विचारों का था उसकी सोच थी कि औरत सिर्फ बच्चे जनने और घर संभालने की मशीन है।

संध्या नाम था उसका साधारण खूबसुरत गठीला बदन गोरा रंग लंबा क़द कोई कमी नहीं थी उसमें पढ़ने में भी तेज़। डाॅ. बनने का सपना था पर उसका ग़रीब परिवार से थी बाप मिल मजदुर था चार बच्चों में सबसे छोटी थी और वो भी लड़की ज़ात। उसका पालन पोषण वैसे ही हुआ जैसे आम भारतीय परिवारों में होता है तीन तीन भाइयों के होते हुए उसको कोई प्यार नहीं करता था। और न मां बाप ज़्यादा परवाह करते थे।

             सरकारी स्कूल में हाईस्कूल तक ही पढ़ पायी थी मां बाप शादी करके घर से निकाल फुर्सत होना चाहते थे। तीनों बड़े भाई बमुश्किल इंटर पास करके मज़दूरी करने लगे थे। बहन की शादी के लिए बड़ी मुश्किल से थोड़ा धन जुटा पाये थे।

             अंततः नियति के आगे किसी की नहीं चलती सपनों के राजकुमार के सपने मन संजोये हुए संध्या की शादी एक ग़रीब घर में हो गयी। रमेश उसका पति सामान्य क़द काठी सांवला और दुबला पतला लड़का था। सुहागरात वाले दिन ही रमेश को देखकर वो अपने भाग्य को कोसने लगी। परंतु धीरे-धीरे उसने हालात से समझौता कर रमेश को अपना पति मानना ही पड़ा।
              समय धीरे-धीरे पंख लगाकर उड़ता रहा ग़रीबी और तंगी के चलते संध्या परेशान रहने लगी। बड़ा परिवार और कमाने वाले दो पति की तरह ससुरजी भी मज़दूरी करते थे। तब जाकर परिवार की गाड़ी चलती थी। दो ननदों की शादी की भी टेंशन थी इंहीं सब परेशानियों को देखते हुए वो अपना  मां बनना टालती जा रही थी। घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए संध्या ने नौकरी करने की इच्छा ज़ाहिर की। परंतु रमेश और उसके परिवारवाले राज़ी नहीं थे। एक समय का लेंगे पर बहुत बेटी से नौकरी नहीं करायेंगे।
              इस बात को लेकर कइ बार घर में झगड़े होने लगे, समय का चक्र चला और संध्या ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया और वो दो प्यारे प्यारे बच्चों की मां बन गयी। घर ख़र्चे बढ़े तो रमेश देर रात तक मज़दूरी करने लगा, देर रात घर से बाहर रहने की वजह से रमेश को शराब की लत लग गई। इधर रमेश की दोनों बहनें शादी की उम्र पार कर गयीं। बड़ी बहन रेखा का पड़ोस के लड़के से चक्कर चला और वो गर्भवती हो गयी। पिताजी ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर सके और खाट पकड़ ली। बड़े-बड़े डाॅक्टरों को दिखाया पर कुछ नहीं हुआ। कमाने वाला एक कम हुआ तो घर में खाने के लाले पड़ गए उस पर बहन की बदनामी संध्या जीवन नर्क बन गया  बच्चों को भी भूखा सुलाना पड़ रहा था।
             रमेश नौकरी के पक्ष में अभी भी नहीं था थक-हारकर संध्या घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का विचार किया तो कोई भी अभिभावक संध्या के घर ट्यूशन पढ़ने अपने बच्चों को भेजने को तैयार नहीं हुआ। कुछ ही दिनों में ससुरजी चल बसे। हालात सुधर नहीं रहे थे। बदनामी और लोगों के तानों से परेशान रेखा घर छोड़कर भाग गई।
            एक रोज़ रमेश के काम से घर लौटते समय एक्सिडेंट हो गया रमेश ने खटिया पकड़ी तो अब संध्या के पास परिवार का पेट पालने और पति के इलाज के लिए घर से बाहर निकलकर नौकरी करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा।
            थोड़ी दौड़ धूप करने पर नौकरी मिल गई तनख्वाह तो ज़्यादा नहीं थी पर इसके सिवा कोई रास्ता नहीं था। दफ्तर भी घर से बहुत दूर था लेकिन क्या करती। परिवार का पेट पालने के लिए नौकरी करनी पड़ी।
क्रमश:

Sunday, June 21, 2020

गलवान घाटी

वो #मुसलमान, जिसकी वजह से घाटी का नाम #गलवान पड़ा।
जिस #गलवान_घाटी को चाईना अपनी जमीन बताकर खून-खराबा कर रहा है। उस गलवान घाटी का नाम एक
मुसलमान "#गुलाम_रसूल_गलवान" के नाम पर रखा गया था। #गुलाम_रसूल_गलवान अपनी लिखी हुई किताब में बताते हैं कि जब 1892 में #चार्ल्स_मरे वहां आए, तो गलवान उनके साथ सफ़र पर निकले थे। चार्ल्स डनमोर के सातवें थे। डनमोर आयरलैंड में एक जगह का नाम है। इन्हीं के साथ जब गुलाम रसूल गलवान निकले, तब उनकी उम्र बमुश्किल 14 साल की थी। इस सफ़र के दौरान उनका काफिला एक जगह अटक गया। वहां सिर्फ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और खड़ी खाइयां थीं। उनके बीच से नदी बह रही थी। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यहां से कैसे निकला जाए! तब 14 साल के #गलवान ने एक आसान रास्ता ढूंढ निकाला, और वहां से #काफिले को निकाल के ले गए।
लद्दाखी इतिहासकार #अब्दुल_गनी_शेख के मुताबिक़, गलवान की ये चतुराई देखकर #चार्ल्स बहुत मूतासिर हुए और उस जगह का नाम #गलवान_नाला रख दिया। गलवान के नाम पर अब वो जगह #गलवान_घाटी कहलाती है।
#सर्वेन्ट_ऑफ़_साहिब्स किताब की खासियत ये है कि ये #गुलाम_रसूल_गलवान की टूटी-फूटी अंग्रेजी में उनके सफ़र नामा को बताती है. गुलाम रसूल गलवान ने अपनी 35 साल के सफरों में #अंग्रेजी, #लद्दाखी, #उर्दू, और #तुर्की ज़बान का बोलना सीख लिया था। बाद में वो लेह में ब्रिटिश कमिश्नर के चीफ असिस्टेंट के ओहदे पर पहुंचे।
उन की पैदाइश 1878 में हुई और 1925 में इंतकाल कर गए।
जिस गलवान घाटी के लिये #चीन और #हिन्दुंस्तान मैं झगड़ा हो रहा है जिसमें हमारे 20 जवान शहीद हो गए। हिन्दुंस्तान कहेता है #गुलाम_रसुल_गलवान हिन्दुंस्तानी था इसलिये वो घाटी भी हमारी है लेकिन चाइना कहे रहा है अगर ये जमीन तुम्हारी है तो कागज़ दिखाओ और ये साबित करो कि #गुलाम_रसुल_गलवान हिन्दुंस्तानी है।
जो लोग कुछ दिन पहेले 20 करोड़ #मुसलमानों से कागज ढुंढने को कह रहे थे, आज वो एक #मुसलमान के #कागज खुद तलाश रहे है।
#अल्लाह की लाठी में आवाज़ नहीं होती है और वो तुम्हारी #साजिशों को तुम्हारे ही मुँह पर मार देता है। वो हर सय पे #कादिर है।